शिक्षा एवं व्यवसाय

माँ पढ़ेगी तो पीढ़ी आगे बढ़ेगी

किसी भी राष्ट्र का भविष्य केवल उसके विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और शिक्षकों पर निर्भर नहीं करता, बल्कि उस वातावरण पर भी निर्भर करता है जो बच्चों को अपने घरों में मिलता है। घर बच्चे की पहली पाठशाला होता है और माँ उसकी पहली शिक्षिका। इसलिए यह कहना बिल्कुल उचित है कि “माँ पढ़ेगी तो पीढ़ी आगे बढ़ेगी।” यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का एक सशक्त सूत्र है।

बच्चे अपने माता-पिता, विशेषकर अपनी माँ, से सबसे अधिक सीखते हैं। वे केवल उनके शब्दों को नहीं सुनते, बल्कि उनके व्यवहार की नकल भी करते हैं। यदि बच्चे अपनी माँ को नियमित रूप से पुस्तकें, समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ या अन्य ज्ञानवर्धक सामग्री पढ़ते हुए देखते हैं, तो उनके मन में भी पढ़ने की आदत स्वतः विकसित होने लगती है। यही आदत आगे चलकर उनके व्यक्तित्व, सोच और सफलता की मजबूत नींव बनती है।

आज का समय तकनीक का युग है। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, टेलीविजन और इंटरनेट ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन इनकी अत्यधिक उपयोगिता ने पुस्तकों से दूरी भी बढ़ा दी है। पहले घरों में शाम के समय अख़बार पढ़े जाते थे, कहानियाँ सुनाई जाती थीं और बच्चों के साथ मिलकर पढ़ाई की जाती थी। आज कई परिवारों में हर सदस्य अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त दिखाई देता है। इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ने की आदत और एकाग्रता पर पड़ रहा है।

अनेक शोध बताते हैं कि जिन बच्चों की माताएँ पढ़ने में रुचि रखती हैं, वे भाषा, गणित, विज्ञान और अन्य विषयों में बेहतर प्रदर्शन करते हैं। ऐसे बच्चों की शब्दावली समृद्ध होती है, उनकी कल्पनाशक्ति अधिक विकसित होती है और वे समस्याओं का समाधान अधिक प्रभावी ढंग से कर पाते हैं। नियमित रूप से पढ़ने वाले परिवारों में संवाद बेहतर होता है और बच्चों का आत्मविश्वास भी अधिक मजबूत होता है।

माँ का पढ़ना केवल बच्चों की शिक्षा तक सीमित नहीं है। एक पढ़ी-लिखी और जागरूक माँ स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छता, आर्थिक प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति भी अधिक सचेत होती है। वह अपने परिवार के लिए बेहतर निर्णय ले सकती है और बच्चों में अच्छे संस्कार विकसित कर सकती है। इस प्रकार एक माँ की सीख पूरे परिवार और समाज के विकास का आधार बन जाती है।

यह आवश्यक नहीं कि माँ उच्च शिक्षित हो। यदि वह प्रतिदिन कुछ समय पुस्तक पढ़ने, अख़बार देखने, बच्चों को कहानी सुनाने या उनके साथ बैठकर पढ़ने में लगाए, तो इसका सकारात्मक प्रभाव निश्चित रूप से दिखाई देगा। छोटे-छोटे प्रयास ही बड़े परिवर्तन की शुरुआत करते हैं।

विद्यालयों की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। स्कूलों को अभिभावक-पठन कार्यक्रम, पुस्तक मेले, कहानी-कथन प्रतियोगिताएँ, पुस्तकालय गतिविधियाँ और परिवार आधारित पठन अभियान चलाने चाहिए। समुदायों और सामाजिक संस्थाओं को भी महिलाओं में पढ़ने की संस्कृति विकसित करने के लिए विशेष प्रयास करने चाहिए। यदि हर मोहल्ले और गाँव में पुस्तकालय तथा सामुदायिक पठन केंद्र सक्रिय हों, तो यह एक नई शैक्षिक क्रांति का आधार बन सकता है।

आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता , डिजिटल तकनीक और ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था के दौर में जीवनभर सीखते रहना आवश्यक हो गया है। यदि माताएँ स्वयं सीखने और पढ़ने की आदत बनाए रखेंगी, तो वे अपने बच्चों को भी बदलते समय के अनुरूप तैयार कर सकेंगी। शिक्षा अब केवल डिग्री प्राप्त करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह निरंतर सीखने की प्रक्रिया बन चुकी है।

इतिहास गवाह है कि अनेक महान वैज्ञानिकों, साहित्यकारों, नेताओं और समाज सुधारकों की सफलता के पीछे उनकी माँ की प्रेरणा, शिक्षा और संस्कार रहे हैं। एक जागरूक माँ अपने बच्चों को केवल अक्षर ज्ञान ही नहीं देती, बल्कि उन्हें ईमानदारी, अनुशासन, संवेदनशीलता और मेहनत का महत्व भी सिखाती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हर घर में पुस्तकों के लिए एक छोटा-सा स्थान हो, परिवार प्रतिदिन कुछ समय सामूहिक रूप से पढ़ने के लिए निकाले और बच्चों के सामने पढ़ने की सकारात्मक संस्कृति विकसित की जाए। जब घरों में पुस्तकें लौटेंगी, तब बच्चों में जिज्ञासा, रचनात्मकता और ज्ञान की प्यास भी बढ़ेगी।

अंततः किसी भी समाज का भविष्य उसकी माताओं के हाथों में होता है। एक माँ जब पढ़ती है तो वह केवल स्वयं को शिक्षित नहीं करती, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान, संस्कार और प्रगति का मार्ग भी प्रशस्त करती है। इसलिए यह कहना बिल्कुल उचित है कि “माँ पढ़ेगी तो पीढ़ी आगे बढ़ेगी।” यदि हमें एक शिक्षित, जागरूक, सशक्त और विकसित भारत का निर्माण करना है, तो हमें घर-घर में पढ़ने की संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा और प्रत्येक माँ को ज्ञान से जोड़ना होगा। यही आने वाले कल की सबसे बड़ी पूँजी होगी।

— डॉ. विजय गर्ग

*डॉ. विजय गर्ग

शैक्षिक स्तंभकार, मलोट

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