धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

भारतीय ज्ञान परंपरा की महत्ता :राष्ट्रीय शिक्षानीति के संदर्भ में

भारतीय ज्ञान परंपरा आज भी प्रासंगिक है, क्योंकि यह आधुनिक जीवन की चुनौतियों जैसे तनाव और भौतिकवाद का समाधान प्रदान करती है, और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत इसे पुनर्जीवित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। यह परंपरा शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कल्याण पर जोर देती है, योग और आयुर्वेद जैसे समाधान प्रस्तुत करती है, और सामाजिक समरसता, नैतिक मूल्यों और स्थायी विकास के सिद्धांतों को बढ़ावा देती है।भारतीय ज्ञान परंपरा तनाव प्रबंधन, मानसिक स्वास्थ्य और भौतिकवाद के नकारात्मक प्रभावों से निपटने के लिए व्यावहारिक तरीके प्रदान करती है, जैसे कि योग और ध्यान।

भारतीय ज्ञान परंपरा का इतिहास बहुत प्राचीन और समृद्ध है, जिसकी जड़ें वैदिक काल से भी पहले की हैं। यह परंपरा वेदों से शुरू होकर उपनिषदों, दर्शन, महाकाव्यों और मध्यकालीन संत साहित्य तक फैली हुई है, जिसमें विज्ञान, दर्शन, समाज, और अध्यात्म जैसे विभिन्न विषयों का समावेश है। इस ज्ञान का प्रसार तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों में हुआ, और यह न केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित था, बल्कि जीवन शैली, कला और शिल्प में भी समाहित था।

भारतीय ज्ञान परंपरा की शुरुआत वेदों से होती है, जिसमें धार्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान के साथ-साथ विज्ञान, गणित और खगोलशास्त्र के भी बीज निहित थे। वैदिक काल के बाद उपनिषदों ने ज्ञान की जिज्ञासा को तर्क और अनुभव के माध्यम से आगे बढ़ाया। सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत जैसे दर्शन विकसित हुए। महाभारत, रामायण, मनुस्मृति और अर्थशास्त्र जैसे ग्रंथों ने राजनीति, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। चरक और सुश्रुत संहिता ने आयुर्वेद में महत्वपूर्ण योगदान दिया। बौद्ध और जैन धर्मों ने ज्ञान की विविधता को और बढ़ाया।भक्ति आंदोलन के दौरान कबीर, तुलसीदास, मीराबाई और गुरु नानक जैसे संतों ने लोकभाषा में रचनाएँ लिखकर ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाया। सिंधु घाटी की सभ्यता से ही वैज्ञानिक दृष्टि के प्रमाण मिलते हैं। गुप्त काल को ‘स्वर्ण युग’ कहा जाता है, जो साहित्य, कला और विज्ञान के उत्कर्ष का काल था।

भारतीय ज्ञान परंपरा में मानव जीवन को नैतिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध करने में है। यह ज्ञान का एक विशाल भंडार है जो दर्शन, विज्ञान (जैसे आयुर्वेद, गणित, खगोलशास्त्र) और कला जैसे विभिन्न क्षेत्रों को समाहित करता है। यह परंपरा न केवल प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर है, बल्कि यह आधुनिक जीवन की चुनौतियों जैसे जलवायु परिवर्तन और मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी प्रासंगिक समाधान प्रदान करती है।

भारतीय ज्ञान परंपरा वैदिक गणित, आयुर्वेद, खगोलशास्त्र और भौतिकी जैसे विषयों में प्राचीन भारत का योगदान अद्वितीय रहा है, जिसे आज भी दुनिया स्वीकार करती है। ज्ञान परंपरा ने प्रेम, समानता और भाईचारे जैसे नैतिक मूल्यों का संदेश दिया, जिसने समाज को समृद्ध किया। तक्षशिला और नालंदा जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों ने दुनिया भर के छात्रों को आकर्षित किया। यह परंपरा भारतीय संस्कृति और जीवन शैली का एक अभिन्न अंग है और इसमें रोजगार के अवसर भी विद्यमान हैं।भारतीय ज्ञान परंपरा श्रेष्ठ नागरिकों को गढ़ने का भी काम करती है,नागरिकों में देशभक्ति का भाव भी जाग्रत करती है। सांस्कृतिक व धार्मिक जागरण लाकर वर्तमान की अनेक समस्याओं का समाधान भी करती है। भारतीय ज्ञान परंपरा हमें हमारे गौरवमय अतीत की विशेषताओं से भी मिलाती है,वे ही विशेषताएं जिनके कारण हम विश्व गुरू कहलाए थे।

— प्रोफेसर शरद नारायण खरे

*प्रो. शरद नारायण खरे

प्राध्यापक व अध्यक्ष इतिहास विभाग शासकीय जे.एम.सी. महिला महाविद्यालय मंडला (म.प्र.)-481661 (मो. 9435484382 / 7049456500) ई-मेल-khare.sharadnarayan@gmail.com

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