राजनीति

केन की धारा में बहता एक सवाल : क्या इंसान भी विकास का हिस्सा है?

विकास तभी सार्थक है, जब उसकी कीमत किसी की पहचान, आजीविका और अस्तित्व न बने। आज भारत इसी प्रश्न के सामने खड़ा है। एक ओर देश की पहली नदी जोड़ो योजना के रूप में केन–बेतवा परियोजना है, जिसे जल, सिंचाई और ऊर्जा का समाधान बताया जा रहा है। दूसरी ओर पन्ना और छतरपुर के जंगलों में आदिवासी महिलाएँ चिता पर लेटकर, शरीर पर मिट्टी मलकर केवल दो वाक्यों में अपना दर्द कह रही हैं—”जंगल हमारा, नदी हमारी” और “न्याय दो या मार दो।” यह केवल विरोध नहीं, लोकतंत्र पर टूटते भरोसे की तस्वीर है। अब सवाल बाँध बनने का नहीं, बल्कि यह है कि विकास की परिभाषा आखिर किसके लिए लिखी जा रही है।

केन–बेतवा परियोजना का प्रमुख हिस्सा दौधन बाँध है, जो पन्ना टाइगर रिजर्व के भीतर प्रस्तावित है। इससे लगभग 9 हजार हेक्टेयर भूमि, जिसमें कोर क्षेत्र का करीब 41.41 वर्ग किलोमीटर और बफर क्षेत्र शामिल हैं, डूबेगी। करीब 23 लाख पेड़ प्रभावित होने और केन नदी का प्राकृतिक प्रवाह बदलकर जल बेतवा में भेजने की आशंका है। सरकार के अनुसार इससे 10.62 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई, 62 लाख लोगों को पेयजल और 103 मेगावाट बिजली मिलेगी। लेकिन गोंड और कोल आदिवासियों के लिए यह केवल विकास नहीं, बल्कि अस्तित्व का सवाल है। उनके लिए जंगल सिर्फ पेड़ नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति, आजीविका और पहचान का आधार है।

वादों और ज़मीनी हकीकत की दूरी ने चिता आंदोलन फिर सुलगा दिया। प्रशासन के आश्वासन के बावजूद कई गाँवों में मकान तोड़े गए, बिजली कनेक्शन काटे गए, स्कूल ढहाए गए और विरोध करने वालों पर मुकदमे दर्ज हुए। दिव्या अहिरवार, लक्ष्मी आदिवासी सहित कई महिलाएँ विरोध में डटी रहीं, जबकि सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर अनशन पर बैठे। उनका दावा है कि 7,000 से अधिक परिवार (लगभग 35-50 हजार लोग) विस्थापन की कगार पर हैं। उनके अनुसार संकट केवल घरों का नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन, आजीविका और सांस्कृतिक पहचान का है। सवाल है— यदि विकास की कीमत आदिवासी समाज चुकाए और लाभ दूसरों को मिले, तो क्या यह न्यायपूर्ण विकास कहलाएगा?

इस संघर्ष का दायरा केवल विस्थापन नहीं, पूरे पारिस्थितिकी तंत्र तक है। पन्ना टाइगर रिजर्व का बड़ा हिस्सा डूबने की आशंका है, जिससे बाघों की पुनर्स्थापना, घड़ियाल संरक्षण और गिद्धों के प्राकृतिक घोंसले संकट में पड़ सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार वृक्ष कटाई और पारिस्थितिकी परिवर्तन से क्षेत्रीय वर्षा में करीब 12 प्रतिशत कमी आ सकती है। केन नदी का प्राकृतिक प्रवाह बदलने से पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ने की आशंका है। आईआईटी बॉम्बे के वैज्ञानिक भी इसके प्राकृतिक तंत्र पर प्रभाव की चेतावनी दे चुके हैं। इसलिए आदिवासियों का “जंगल हमारा, नदी हमारी” कहना विकास विरोध नहीं, बल्कि प्रकृति और भविष्य की चिंता है।

किसी भी विस्थापन की सबसे बड़ी कीमत आँकड़े नहीं, इंसानी ज़िंदगियाँ चुकाती हैं। केन–बेतवा परियोजना भी इसी सच्चाई के सामने है। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार 7 हजार से अधिक परिवार प्रभावित होंगे और 22 गाँव डूब क्षेत्र में समा जाएँगे। पुनर्वास को लेकर असंतोष है। किसी को साढ़े बारह लाख, तो किसी को केवल साढ़े सात लाख रुपये मुआवजा मिल रहा है। वयस्क सदस्यों को अलग परिवार का दर्जा देने की माँग अधूरी है। आदिवासी समाज नकद नहीं, “भूमि के बदले भूमि” चाहता है, क्योंकि जंगल और खेत उसके जीवन का आधार हैं। आंदोलनकारियों का आरोप है कि वन अधिकार अधिनियम, 2006 के अधिकारों की अनदेखी हो रही है। पर्याप्त सूचना बिना मकान तोड़े जाने से प्रशासन और समाज के बीच भरोसे की खाई गहरी हुई है।

तस्वीर का दूसरा पहलू भी अहम है। सरकार का तर्क है कि भविष्य की जल जरूरतों के लिए बड़े समाधान जरूरी हैं। सिंचाई, पेयजल और बिजली जैसी बुनियादी जरूरतों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। लेकिन सवाल है कि किसी परियोजना का मूल्य केवल लाभ से तय होगा या उसकी सामाजिक और पर्यावरणीय कीमत से भी। केन–बेतवा परियोजना ने फिर बहस छेड़ी है कि नदी जोड़ो योजनाएँ तभी सफल होंगी, जब वे स्थानीय परिस्थितियों, पारिस्थितिकी और समाज की जरूरतों के अनुरूप हों। केवल इंजीनियरिंग समाधान, प्रकृति और समुदाय की सहमति बिना, स्थायी नहीं हो सकते। विकास तभी सार्थक है, जब लाभ और कीमत का न्यायपूर्ण संतुलन हो।

बड़ी परियोजनाओं के साथ छोटे, टिकाऊ विकल्प भी जरूरी हैं। विशेषज्ञ वर्षा जल संचयन, छोटे बाँध, जलग्रहण प्रबंधन और स्थानीय जल संरक्षण को बेहतर समाधान मानते हैं। सवाल है कि मध्य प्रदेश अपने जंगलों, वन्य संपदा और जल संसाधनों की कीमत चुका रहा है, जबकि लाभ का बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश को मिलेगा। सर्वोच्च न्यायालय की सेंट्रल एम्पावर्ड कमिटी ने भी परियोजना की पर्यावरणीय और आर्थिक व्यवहार्यता पर गंभीर आपत्तियाँ दर्ज की थीं, लेकिन उन्हें महत्व नहीं मिला। यदि बड़े निर्णयों में वैज्ञानिक चेतावनियाँ, स्थानीय अनुभव और न्यायपूर्ण पुनर्वास उपेक्षित रहें, तो विकास का दावा संदेह के घेरे में आता है। लोकतंत्र की शक्ति केवल निर्णय में नहीं, असहमति सुनने में भी है।

पन्ना और छतरपुर से उठता यह संघर्ष अब केवल कुछ गाँवों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल उठाता है कि भारत का विकास प्रकृति और मानव के संतुलन के साथ होगा या जंगलों और संस्कृतियों की कीमत पर। आदिवासी महिलाओं का संघर्ष केवल मुआवजे का नहीं, बल्कि सम्मान, अस्तित्व और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों का है। सरकार को पारदर्शी पुनर्वास, प्रभावी पर्यावरणीय समीक्षा और स्थानीय समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। पन्ना टाइगर रिजर्व के नुकसान की भरपाई के लिए ग्रेटर पन्ना लैंडस्केप प्लान के तहत 47,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में वन विकास प्रस्तावित है। इतिहास बाँधों की ऊँचाई नहीं, बल्कि कमजोर वर्गों के साथ राष्ट्र के व्यवहार को याद रखता है। विकास तभी टिकाऊ होगा, जब वह प्रकृति और लोगों की सहमति से आगे बढ़े।

— प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

प्रो. आरके जैन 'अरिजीत'

बड़वानी (मप्र)

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