बाईक पर बंधी इंसानियत
कंधों का धर्म भी सुविधा के दर पे हार गया,
पिता का दुःख “बाईक” का सफ़र बन गया।
वो चार कंधों से सीट पर सिमटकर रह गया,
अंजाने 10 किलोमीटर का सफ़र बन गया।
आज जिसे फूलों की “सेज” नसीब होना थी,
चादर में लिपटी धूसर राहों से गुज़र रही थी।
और सभ्यता की ऊँची इमारतें मौन खड़ी थी,
यहाँ तमाशाइयों की भीड़ नज़र ना आई थी।
यह केवल एक “बेटी” की अंतिम विदाई नहीं,
ये व्यवस्था की संवेदनाओं का जनाज़ा सही।
जहाँ बिन ट्रैफिक़ एम्बुलेंस के पहिए रुक गए,
वहाँ मजबूरी के साये पेड-पौधे भी झुक गए।
इतिहास के पन्नों पर इस दर्द को दर्ज करना,
ताकि आने वाली जेन जी पीढ़ियाँ जान सकें
कि गाइज़ एक दौर ऐसा भी हुआ करता था,
लाश से पूर्व इंसानियत को मरना पड़ता था।
आओ संकल्प लें, अब ऐसी कोई राह न बचे,
जहाँ किसी पिता-भाई,परिवार व पालक को!
अंतिम यात्रा मजबूरी में ऐसे पूरी करना पड़े?
सच्चे संवेदनशील समाज में सभी साथ खड़े।
(संदर्भ – नाबालिग बेटी की लाश बाईक पर ले गए।)
— संजय एम तराणेकर
