हम अपने बच्चों को क्या दे रहे हैं ?
आए दिन छोटे छोटे बच्चों का आत्म हत्याएं करना, अपराध करना, वास्तव में दुखद है ऐसा क्या हो जाता है कि बच्चे जीवन से ही हार मान लेते हैं, या अपराध कर बैठते हैं। एक ओर संवाद, धैर्य की कमी, दूसरी ओर परिपक्वता की कमी है। सबने अपने चारों ओर बाउंड्रीज बना रखी हैं, कोई उनकी निजता में प्रवेश नहीं कर सकता और उम्र इतनी परिपक्व नहीं होती कि भला बुरा कुछ समझ सके। इसी पर याद आया, हमारे समय में जब फिल्मी गाने, डांस, फैशन बड़ों के सामने एक तरह से वर्जित था। जाने कितनी चिरौरी करने के बाद फिल्म देखने जा पाते थे। एक बार घर पर छोटे बच्चे ने किसी फिल्म का गाना केवल गुनगुना दिया था बड़ों के सामने। तब जो डांट पड़ी थी कि बस पूछो मत। और तब न घरवालों ने, ना ही बच्चे ने गुस्सा माना या मुंह फुला कर बैठ गए। आजकल तो डर के मारे किसी को कुछ कह भी नहीं सकते। कहेंगे क्या जब स्वयं मातापिता ही इन प्रोग्रामों/किरदारों के लिए प्रमोट करते हैं, बुजुर्ग पीढ़ी (स्त्री पुरुष दोनों) भी कहां पीछे है। कई बार सोचती हूं स्क्रीन पर ये किस लोक के वासी दिखाए जाते हैं, जिनमें हर वक्त सुरा सेवन, पानी से अधिक दिखाया जाता है, आखिर क्या दे रहे हैं हम बच्चों को, ये किस समाज की कल्पना है।
बालम थानेदार चलावै जिपसी, गाने पर मटकती बच्ची
अश्लील भाव भंगिमाओं पर नृत्य करते बाल कलाकार
बसपन का प्यार, गाने वाला हिट बच्चा
गंगूबाई के करैक्टर में, बीड़ी पीने की एक्टिंग करती बच्ची , मुन्नी बदनाम जैसे गाने
या एक आंख ढांके खलनायक आइडियल स्टार
ये हैं आज के प्रेरक व्यक्तित्व, फिर हमारी बच्चों से चाहत है कि वे राम सा चरित्रवान, कृष्ण सा लीलाधारी, श्रवण सा आज्ञाकारी, विवेकानंद, दयानंद, बाल गंगाधर जैसे समाज सुधारक, वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर बनें। यह कैसे संभव है। ऐसा लगता है बौद्धिकता पर भौतिकता और सादगी पर चमक दमक हावी हो रही है।
हमारे समाज में परिवर्तन लाने वाले कई लोग हुए, अपने अपने क्षेत्र में इनका खासा योगदान रहा है। यह लोग क्रांतिकारी, कलाकार, संत, योगी, समाजसेवी, वैज्ञानिकों से लेकर आध्यात्मिक गुरुओं तक हुए हैं। आजकल के बच्चे आर्यभट्ट, शिवाजी, गार्गी, मैत्रयी, महादेवी वर्मा, सावित्री देवी फुले, राम कृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, दयानंद, बाल गंगाधर, पटेल … आदि आदि, ऐसे अनेकों अनेक के बारे में तो जानते ही नहीं किस लोक के वासी हैं? राज्यों के मुख्यमंत्री, देश के नेताओं, विभिन्न संस्थानों के प्रमुख आदि के बारे में भी पूछेंगे तो उत्तर यही होगा, यह नाम हमने तो नहीं सुना कभी। सामान्य ज्ञान का मानो अकाल पड़ा है। इन नामों की तो छोड़ो इन्हें तो अपने दादा दादी, नाना नानी, रिश्तेदार, पड़ौसी तक के नाम नहीं पता। पहले ये जानकारियां सामान्य बात होती थी। इसके बावजूद इन्हें चाहिए सब कुछ।
लेकिन आज की पीढ़ी का करेंट अफेयर्स की जानकारी के नाम पर कुछ फिल्म स्टार्स, खानों और कपूरों के साथ-साथ क्रिकेटर्स की जानकारी पर्याप्त है। चाहो तो रैपर्स, सिंगर्स, डांसर्स की फुल जानकारी सुना दें, नशे में लड़खड़ाते बचपन का यही इनका परम ज्ञान है। चिड़िया जैसे पंखों वाले रंग बिरंगे बाल, कमर से नीचे खिसकती बेतुकी सी फटी जींस, जरूरत पड़ने पर ढंग से भाग भी नहीं सकते, यही इनकी पहचान है। हां! राजनीति के नाम पर मोदी जी, राहुल जी के बारे में अवश्य थोड़ी जानकारी रखते हैं।
उनकी नजर में सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक जीवन में चेतना फैलाने वाले लोगों ने आम जिंदगी में बदलाव लाने में जो अहम भूमिका निभाई है, वह कुछ लोगों के लिए मात्र एक सनक है। ऐसे सनकी लोगों को समाजसेवा नाम के कीड़े ने काट खाया होता है।
अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम।
दास “मलूका” कह गए सबके दाता राम।।
ऐसे बच्चों का कहना है कि ज्ञान की बातें तो माता पिता, टीचर्स, सीनियर्स, बुजुर्ग खूब कर लेते हैं उनके नैतिक भाषण सुन सुन के दिमाग पक गया है। आपको बातें करनी है तो, तुरंत पैसा कैसे बनाया जाए, विदेश, सिनेमा, रियलिटी शोज, वेब सीरीज (जिन सब में अधिकतर फूहड़ता की भरमार है) क्रिकेट, राजनीति की करो या बाजार में नए आ रहे कार, मोबाइल, गैजेट्स की करो, बस। रील बनाना, यू ट्यूब पर कुछ भी अपलोड करना, कुछ लोगों के लिए यही जिंदगी है, इसके आकर्षण से बच पाना मुश्किल होता जा रहा है। पढ़ना नहीं, लिखना नहीं, प्रसिद्धि पूरी मिलती हो, पैसा भी मिलता हो तो क्यों करें सेवा, शिक्षा, संस्कृति की बातें। अखबारों, पत्र पत्रिकाओं, विज्ञापनों में भी इन्हीं की धूम मची हुई है। चारों ओर ग्लैमर रोग से पीड़ित लोगों का हुजूम दिखाई देता है। रिएलिटी शोज में एंट्री के लिए लोगों की लंबी कतारें देखी जा सकती हैं।
इन सबके लिए केवल समाज ही नहीं मातापिता भी जिम्मेदार हैं, जो जरा सी देर की प्रसिद्धि के लिए बच्चों को भी इस अंधे कुएं में धकेलने से नहीं चूकते, बाद में कास्टिंग काउच, लव जिहाद, धर्म परिवर्तन, शोषण का रोना। बाद में ये मातापिता भी डर के साए में जी रहे होते हैं, बच्चा कोई गलत कदम (आत्महत्या जैसा) ना उठा ले। और इसमें गरीब ही नहीं अच्छे धनाढ्य शिक्षित वर्ग भी शामिल है, हर चीज के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराकर अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं हो सकती। समाज हम लोगों से ही बनता है, हमें भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।
— मनु वाशिष्ठ
