कुंदन
तप की आँच सहन जो करता।
नहीं किसी से है वो डरता।।
मन के सारे मैल मिटाता।
गीत स्वार्थ के कभी न गाता।।
सारे दुख जो हँसकर झेले।
बन कुंदन सम हर पल खेले।।
राम-नाम कुंदन सम प्यारा।
कट जाता भव बंधन सारा।।
यह समाज की भट्टी भारी।
बन कुंदन तपते नर-नारी।।
निज चरित्र जो उज्ज्वल रखता।
कुंदन हम वो सदा चमकता।।
सच का है संकट से नाता।
कुंदन कब किसको भरमाता।।
दीन-दुखी की सेवा करना।
कुंदन बनकर सदा चमकना।।
भेदभाव से कैसा नाता।
कुंदन खुद कब कहे विधाता।।
जो भी पावन निर्मल रहता।
ईश्वर नाम जाप वो करता।।
