अपनी हर ख़ुशी का ढिंढोरा पीटने के बजाय, उसे सहेज कर रखना सीखें
जीवन के इस सफ़र र में कई बार हम अनजाने में ही अपनी खुशियों का शोर मचाने लगते हैं, यह सोचे बिना कि हर कोई हमारी कामयाबी में सच्चे दिल से ख़ुश नहीं होता। असल में, इंसान अक्सर अपनी खुशियों की नुमाइश (प्रदर्शन) करने की जल्दी में यह भूल जाता है कि नज़र लगने का वहम ही नहीं, बल्कि एक हक़ीक़त भी है,कभी लोगों की ईर्ष्या भरी निगाहें, तो कभी उनके नकारात्मक शब्द हमारी खुशियों की चमक को फीका कर सकते हैं। समय और तजुर्बे के साथ यह बात समझ आती है कि कुछ बातें, कुछ कामयाबियाँ और कुछ खुशियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें लफ़्ज़ों में बयां करने के बजाय अपनी ख़ामोशी की आग़ोश में छुपा लेना ही बेहतर है। यह दुनिया का दस्तूर है कि वह हर मोड़ पर आपकी जीत का जश्न नहीं मनाती, इसलिए अपनी खुशियों को दूसरों की नज़रों से महफूज़ रखना ही असल दानिशमंदी (बुद्धिमानी) है। जब ज़िंदगी में सब कुछ अच्छा चल रहा हो, तो अपनी ज़ुबान पर क़ाबू रखना और ख़ामोशी को अपना साथी बनाना ही सबसे बड़ा हिफ़ाज़ती कवच है, क्योंकि जो ख़ुशी राज रहकर फ़लती-फ़ुलती है, वह ज़्यादा देर तक सुकून और ठहराव लेकर आती है। संक्षेप में कहें तो, अपनी हर ख़ुशी का ढिंढोरा पीटने के बजाय, उसे सहेज कर रखना सीखें, क्योंकि अक्सर कम बोलना और अपने जज़्बात को संभाल कर रखना ही ज़िंदगी को हसीन और सुरक्षित बनाता है।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
