ग़ज़ल
कौओं ने पंचायत कर सब, बगुलों को बदनाम बताया
कोयल ने भी पंचम सुर में, दादुर संग कोहराम मचाया।
श्वान चाटते फिरते तलवे, कुटियों की रखवाली भूले,
मोर बने विषधर के साथी,बीनों के सुर नाच दिखाया।
इंद्रधनुष से रंग चुराकर, गिरगिट बन बैठा व्यापारी,
भेष बदलकर रंग-बिरंगा, अच्छा उसने रंग जमाया।
गिद्धों काआमंत्रण पाकर, खग-कपोत हैं जश्न मनाते,
रंगे सियारों ने चिल्लाकर, बाजों को साधू बतलाया।
मौन ‘शरद’ तकता है सबको, बड़ी अनोखी है ये दुनिया,
शाकाहारी शेर देखकर, हिरणों का भी सिर चकराया।
— शरद सुनेरी
