गीत/नवगीत

गीत

तुमने पाया जिसको करके सौ जतन था हे मनुज
सच बताना आज उसका मोल क्या कुछ भी नहीं है?

पाँव के छाले बिवाई बनके पकते जा रहे हैं
इस पराजय की निराशा में थकन है जानते हैं
हे पथिक तुम रुक न जाना, है क्षितिज के पार जाना
और जीवट से झुकेगा हर गगन ये जानते हैं
पी गए हैं अश्रु सागर जो समर सैनानी बन कर
दस दिशाओं का उन्हें भूगोल क्या? कुछ भी नहीं है

घोष हो, उद्गार हो, गांडीव की टंकार भी हो
है स्मरण संग्राम में बंदी बनाये जा रहे हो
रण के बांकुर वीर सुन लो, तीर और तूणीर चुन लो
युद्ध में हर एक अभिमन्यु बनाये जा रहे हो
मौन जिनको है तुम्हारा रज के कण सा सूक्ष्म दिखता
उनको कोई बोल या अबोल क्या? कुछ भी नहीं है

तुमने पाया जिसको करके सौ जतन था हे मनुज
सच बताना आज उसका मोल क्या कुछ भी नहीं है?

— प्रियंका अग्निहोत्री “गीत”

प्रियंका अग्निहोत्री 'गीत'

पुत्री श्रीमती पुष्पा अवस्थी

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