कविता – कितना लिखूँ
आग की भट्टी में
दही पका रहे हैं
घर में आग लगी है
रसमलाई खा रहे हैं
बाप बेटे पर तीर चला रहा है
बेटा बाप का पगड़ी उछाल रहा है
भांग खाकर सब गिरे हैं
एक दूसरे के गिरेबान खींच रहे हैं
कबीर सब देख रहा है
कौन रबड़ी खा रहा है
कौन सूखी रोटी
आग दोनों के घर में लगी है
वो उसका घर बुझा रहा है
वह उसका बुझा रहा है
वह चुराकर गुड़ खाया
तो गोली चल गयी
वह सब खाया तो
जश्न का कोठा सजा है
कितना लिखूँ
सब जगह शेर खड़ा दहाड़ रहा है
— जयचन्द प्रजापति जय’
