प्रकृति का आँचल
ऊँचे पहाड़ों पर सफर,
पुरवाई पवन का शोर।
ये हरे- भरे वन हमें,
करते भाव – विभोर।
कोहरे बादल की छाँव कहीं,
कहीं झलकते सूरज का उजाला।
हरियाली की चादर ओढ़े,
प्रकृति का रंग निराला।
मौसम से सुसज्जित पर्वत,
गूँजती निर्झर की धारा।
शीतल जल को जीवंत करें,
मधुबन को देती सहारा।
कुहक उठी मुक्तांगन में
कोयल की मधुर तरंग।
जिसके श्रवण से जागे,
मन में नई उमंग।
तमन्ना इस दौर में जीवन,
सादगी – ताज़गी से भरी हों।
ना हो कोई दिखावा राहों में,
हर एक साँस में सुकून भरी हों।
गर थक जाऊँ मुसाफ़िर मैं,
थम जाएं इस नीरव में पांव।
जहाँ हों एक हर्षित ऊर्जा,
और आश्रय की छाँव।
— रेबेल रमेश खटकर
