धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

एक कड़वा सत्य

कुर्बानी देने से ना खून अल्लाह तक पहुंचता है और ना ही शिवलिंग पर दूध चढ़ाने से दूध शिव तक पहुँचता है ।
दोनों क्रियाएं अन्धविश्वास का ही एक रूप है । दोनों ही ईश्वर के सम्बन्ध में मिथ्या धारणा को जन्म देती है | अन्तर इतना ही है कि दूध बहाना कम मूर्खतापूर्ण है और खून बहाना अत्यंत मूर्खतापूर्ण व अत्यंत अमानवीय कृत्य ।
हिन्दू संस्कारों में कहीं ना कहीं गायत्री मन्त्र (वेद) का प्रभाव है, जो ईश्वर से बुद्धि व विवेक की कामना करता है । यही कारण है कि हिन्दुओं ने अनेको कुरीतियों का त्याग कर जीवन को उत्कृष्ट बनाया है । परन्तु मुसलमानों ने अपने बुद्धि विवेक के आगे ताला लगा दिया है ।
कुरान के किसी भी अनर्गल बात पर प्रश्न करने को निषेध किया गया है । परिणाम स्वरूप मुसलमानों का बौद्धिक विकास अवरुद्ध हो गया है ।
मुझे विश्वास है कि एक दिन हिन्दू यह समझ जायेगा कि,
राम की मूर्ति राम नहीं है । मूर्ति को खिलाया खाना, राम ने नही खाया । वह तो मूर्ति पर लगे लगे ही सड़ जायेगा |
कृष्ण को झुलाया गया झूला । कृष्ण ने नही झूला, वह तो मूर्ति ने झूला है |
शिवलिंग पर बहाये दूध से शिव ने नहीं नहाया, बल्कि पत्थर ने नहाया है ।
जब तक वेद के सिद्धान्त हिन्दू के जीवन में सुरक्षित है, वह उन्नति करता रहेगा । अन्यथा उसका जीवन भी मुसलमानों की तरह कुरीतियों की दलदल में धस जायेगा ।
आइये ! वेद की शरण में और ईश्वर से बुद्धि की कामना करें |
— राजेश बरनवाल

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