सूना हर दरबार
धर्म नहीं बाज़ार है, श्रद्धा ज्यों व्यापार।
लोभी जहाँ प्रधान हो, सूना हर दरबार॥
धर्म बना व्यवसाय जब, खो बैठा संस्कार।
भूखे जन की थाल में, पहुँचा कब उपहार॥
रोटी से बढ़कर नहीं, कोई भी उपकार—
लोभी जहाँ प्रधान हो, सूना हर दरबार॥
दौर अजब ऐसा चला, हर जन है बीमार।
दर्दों के इस दौर में, चलता खूब व्यापार॥
सेवा, दया, उपचार का, होता क्यों संहार—
लोभी जहाँ प्रधान हो, सूना हर दरबार॥
कल सुनहरा आएगा, देकर झूठी आस।
सपने भी अब हो गए, खुलकर अब नीलाम॥
उम्मीदों के नाम पर, बिकता हर आकार—
लोभी जहाँ प्रधान हो, सूना हर दरबार॥
सूखे खेत-खलिहान हैं, रोता है किसान।
मेहनत की हर बूँद पर, बैठा है तूफ़ान॥
बादल भी सौदे करें, कैसा यह व्यवहार—
लोभी जहाँ प्रधान हो, सूना हर दरबार॥
हर नौजवान देश का, लेकर टूटी आस।
रोज़गार के नाम पर, मिलता केवल त्रास॥
डिग्रियों के ढेर पर, बिकता है अधिकार—
लोभी जहाँ प्रधान हो, सूना हर दरबार॥
कलम अगर बिकने लगे, मर जाए विचारस
झूठ लिखे उनको मिले, अब तो बस सत्कार॥
शब्दों का भी हो गया, अब तो कारोबार—
लोभी जहाँ प्रधान हो, सूना हर दरबार॥
‘सौरभ’ धर्म बचाइए, बचने दीजै लाज।
सेवा से बढ़कर नहीं, कोई दूजा काज॥
धर्म नहीं बाज़ार है, श्रद्धा ज्यों व्यापार।
लोभी जहाँ प्रधान हो, सूना हर दरबार॥
— डॉ. प्रियंका सौरभ
