पेंशन
सतीश ने अखबार मोड़कर रख दिया और एक लम्बी आह भरी।
“क्या हुआ?” पत्नी गौतमी ने हैरत से पूछा।
“वृद्धाश्रम में एक और स्त्री की मृत्यु हो गई। घर पर खबर करने पर भी कोई अंतिम समय न मिलने आया, न ही मृत काया को लेने ही कोई आया।”
“ओह! यही तो दुनिया है। अपना रक्त भी अपने मतलब से ही बहता है, वरना वह भी सूख जाता है।”
“तुम्हें वह लतिका याद है?” सतीश ने गौतमी की ओर प्रश्नसूचक दृष्टि से देखा।
“हाँ, वही जो आपके साथ पढ़ती थी। वह भी तो बहुत दुखी थी कि उसके पिताजी को उसके भाई-भाभी वृंदावन छोड़ आए थे।”
“बिल्कुल! उसने अपनी सास को अपने ही साथ रखा हुआ है जबकि उसका अय्याश पति किसी और के साथ गुलछर्रे उड़ा रहा है। मैं जब भी उसे देखता हूँ, मेरा मन श्रद्धा से भर जाता है। विश्वास ही नहीं होता कि यही लतिका बचपन से बहुत तेज-तर्रार हुआ करती थी।”
“इतनी श्रद्धा की भी पात्र नहीं है वह। कभी-कभी इंसान अपना फायदा देख कर भी घर के बूढ़ों को साथ में रख लेता है।”
“लतिका के बच्चे बड़े हो गए हैं। वह खुद भी नौकरी छोड़ चुकी है। दिन-रात अपनी सास की सेवा कर रही है। अब वह मेरी क्लासमेट है तो ईर्ष्या के कारण उसकी ज़रा सी तारीफ़ भी तुमसे बर्दाश्त नहीं हो रहा?”
“सही कहा आपने कि दिन-रात अपनी सास की सेवा कर रही है। यही नहीं, उनकी लम्बी उम्र के लिए प्रार्थना भी खूब कर रही है।” व्यंग्यात्मक लहजे में गौतमी बोली।
“लो, फिर भी उसकी तारीफ इतने कँटीले व्यंग्य बाणों के साथ कर रही हो?”
“क्योंकि उसकी सास एक सरकारी पद से सेवानिवृत्त है और उनकी अपनी पेंशन के साथ ही दिवंगत पति की पेंशन भी उन्हीं के खाते में आती है।”
— डॉ. आरती लोकेश गोयल
