लघुकथा

सुनहरा भविष्य

“काकू, तू लॉन की घास काट ले। मैं तब तक खाना बनाकर आता हूँ।” भोलू अपने बेटे को लॉन और कैंची दिखाता हुआ बोला। 

“ठीक है बापू! इस बार सब्ज़ी के छिलके फेंकना मत। अपनी गाय के लिए रख लेना।” सात साल के काकू को अपनी गुलाबो याद आई जो अब सूख के काली पड़ गई है। 

“ठीक है काकू। तू भी कटी हुई घास रख लेना। मैं मालिक से आज्ञा ले लूँगा।”  

“अरे! आज्ञा क्या लेनी है। गाय को खिलाना तो पुण्य का काम है।” बाहर बरामदे में बैठे अखबार पढ़ते हुए पंडित रत्नाकर बोले। 

“करम है आपका प्रभु! गाय को चारा हो जाएगा।” 

“भोलू! तुम्हारा ये बेटा… क्या नाम बताया इसका? हाँ, काकू…, काकू स्कूल जाता है?” 

“कहाँ मालिक! कैसे भेजेंगे हम इसे इस्कूल-विस्कूल?” 

पंडित रत्नाकर का पुत्र अम्बुद अपने कॉन्वेंट स्कूल की यूनिफ़ॉर्म में बाहर आया।

‘अम्बू! बेटा, तुम ‘बेस्ट आऊट ऑफ़ द वेस्ट’ पर प्रोजेक्ट बना रहे थे न? इस काकू से कुछ सीखो।”   

“उँह!…” 

मुँह बिचकाकर अम्बुद कार में जा बैठा और ड्राइवर फ़र्र से कार ले गया। 

तुम्हारे बेटे को भी खूब पढ़ना चाहिए। पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बना देंगे इसे। 

“मेहरबानी मालिक!” 

तब से ही भोलू सपने देखने लगा था। काकू उसे अम्बू की तरह वर्दी में दिखाई देता। दिन-रात पढ़ाई और परीक्षा में डूबा हुआ… फर्राटेदार अंग्रेज़ी बोलता हुआ… बड़ा आदमी बनता हुआ… कार में जाता हुआ… परिवार की गरीबी मिटाता हुआ… इत्यादि।  

“इसे स्कूल भेजने का जुगाड़ कहाँ है हमारे पास।” 

“अरे! हम हैं न! चिंता किस बात की।” 

“आप भला ही सोचेंगे काकू का।”  भोलू ने हाथ जोड़े।

“मास्टर जी, आप कह रहे थे न कि आपके म्यूनिसिपलिटी स्कूल में बच्चे नहीं है, दाखिला कराओ। एक बच्चे का नाम लिखो- काकू।” रत्नाकर जी किसी से फ़ोन पर बोले। 

— डॉ. आरती ‘लोकेश’

डॉ. आरती ‘लोकेश’

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