राजा और उसके नवरत्न
एक सुदूर देश में एक राजा था। अब राजा ऐसा ही था जैसे राजा होते हैं। दिन भर चापलूसों से घिरे रहना, हर समय हम हम करना और दिन में कम से कम चार बार कपड़े बदलना। राजा का यही काम था। इसी काम में वह दिन के अठारह बीस घंटे बिता देता था। मतलब सबकुछ मिला कर वह पूरा दिन आराम से बिता देता था।राजा जब कभी अपने देश में बोर होता तो किसी और देश में घूम आता। उस देश में भी खूब मौज मस्ती होती। शाही सत्कार, राजकीय सम्मान, नाच गाना, खाना पीना, मतलब सब कुछ होता। हाँ, वहाँ से कोई मैडल वैडल भी ले आता। तो राजा के दिन इस तरह आराम से गुजर रहे थे।
इन सब कामों से समय मिलता तो राजा राजकाज की भी सोचता था। जब राजकाज सूझता था तो राजदरबार सजता था। राजदरबार होता तो राजा का था पर उसमें वह आता कम ही था। उसके नवरत्न ही कामकाज सम्हालते थे। वह जब भी आता था तो या तो हंसी ठिठोली में ही लगा रहता था या फिर पुराने राजाओं की बुराई में। तो इस तरह से राजा के दिन बड़े अच्छे गुजर रहे थे।भरी दोपहर का समय था। तारीख थी 20 जुलाई, 2026। विश्वगुरु देश के राजा जी अपने महल हांफते हांफते पहुँचे। जब राजा जी अपने राज्य के राजा जी बने तो उन्होंने अपने महल के मार्ग का नाम लोक कल्याण मार्ग रख लिया। अब वे लोक कल्याण के मार्ग चलें, न चलें, लोक कल्याण मार्ग पर ही चलते हैं। लोक कल्याण मार्ग से ही जाते हैं और लोक कल्याण मार्ग से ही वापिस आते हैं। राजा जी का हर रोज लोक कल्याण करते रहने का यह अनोखा तरीका है।राजा जी के घर पहुंचते ही उनका प्रिय सेवक एक ट्रे में एक गिलास पानी और एक प्लेट में काजू किशमिश ले कर पहुंचा। एक दूसरा सेवक अपने दोनों हाथों में दो दो, मतलब कुल चार बिल्कुल नई जैकेट ले कर पहुंच गया। उसे पता था कि महाराज जी घर आए हैं तो कपड़े तो बदलेंगे ही। कई बार तो घर के बाहर भी कपड़े बदल लेते हैं। क्या पता अब राजा जी बदल कर कौन सी जैकेट पहन लें।जब राजा जी घर पहुँचे तो थर थर कांप रहे थे। इतनी जोर से कांप रहे थे कि जब उनके हाथ में पानी का गिलास पकड़ाया गया तो आधे से अधिक पानी गिलास से छलक ही गया। अगर सेवक थाम न लेता तो शायद गिलास जमीन पर ही गिर जाता।राजा जी अभी – अभी अपने नये राजमहल के पिछले दरवाजे से बाहर निकल कर आए थे। शायद पुराने राजमहल भवन में इमरजेंसी के समय भागने के लिए पिछला दरवाजा नहीं था। यदि रहा भी होगा तो जाम हो ही गया होगा क्योंकि जबसे पुराना वाला राजमहल बना था किसी ने भी उसका इस्तेमाल ही नहीं किया था। इसीलिए राजा जी ने नया राजमहल बनवाया था। वैसे राजा जी इमरजेंसी शब्द से बहुत घृणा करते हैं पर इमरजेंसी के वक़्त बैक डोर से निकलने में भी माहिर हैं।
महल के सेवकों को लगा, राजा जी बहुत गुस्से में हैं। पर नहीं, राजा साहब गुस्से में नहीं थे, राजा साहब बहुत डरे हुए थे। बहुत डरे हुए। इतने डरे हुए कि उन्हें, अपने पांच सात लेयर की सुरक्षा वाले घर में पहुंच भी डर से कांप रहे थे। इस डर की वजह से ही वे नये राष्ट्रीय राजमहल से भाग कर अपने महल पहुँचे थे। यह पहली बार नहीं था कि राजा जी डरे थे। वे इसी राष्ट्रीय राजमहल में एक बार पहले भी डरे थे। डरे थे जब कुछ प्रजा की महिलाओं ने उन्हें उनके राज सिंहासन पर घेर लिया था। उन्हें डर था कि ये महिलाएं उनका मुँह ना नोच लें, उन्हें काट ना खाएं, अपनी हेयर पिनों से उन पर आक्रमण न कर दें। उस दिन भी आदरणीय लोकसभा अध्यक्ष जी अर्थात उनके वजीर ने उन्हें उन महिलाओं से बचा कर उनके महल पहुंचा दिया था। उस समय राजा जी ने चाहा था कि वे कानून बना दें कि कोई भी महिला बढ़े हुए नाखून नहीं रखेगी, दाँत घिसवा कर ही राजमहल आएगी और बालों में हेयर पिन का इस्तेमाल नहीं करेगी पर उनकी ही सेवक कुछ महिलाओं ने इसके लिए मना कर दिया।किस्सा तो यह भी है कि एक बार, जब वे देश के नहीं, अपने प्रदेश के राजा जी होते थे तो उनके राजनिवास के समीप एक ट्रक का टायर फट गया था। रात का समय था और राजा जी अपने शयन कक्ष में सो रहे थे। टायर फटा तो राजा जी को लगा बम फटा है। तो वे भाग कर बाथरूम में छिप गए थे। जब उनके सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें बताया कि महाराज , वह बम विस्फोट नहीं था, ट्रक का टायर फटा था, तब जा कर राजा जी अपने बिस्तर पर लौटे और सो पाए।इस बार डर की वजह थे वे निहत्थे नौजवान, वे कॉकरोच, वे छात्र जो पिछले बीस से अधिक दिनों से जंतर मंतर पर धरना दिये बैठे हुए थे, अनशन पर थे, भूख हड़ताल पर थे और 20 जुलाई के दिन राष्ट्रीय राजमहल की ओर मार्च कर रहे थे। राजा जी को डर यह नहीं था कि ये छात्र, ये बच्चे राजमहल तक पहुंच कर उन्हें घेर लेंगे। उनके ग्रह मंत्री जी की पुलिस मुस्तैद थी। उन्हें आदेश था कि इन्हें आगे नहीं बढ़ने देना है। बेरीकेड की रोक है, लाठी की मार है, पानी की धार है, और आगे बढ़े तो अश्रु गैस के गोले हैं, पेलट गन के छर्रे हैं। फिर भी नहीं रुके तो रक्षा मंत्री जी की सेना भी तैयार है। डर उन्हें यह था कि इन बच्चों ने, छात्र छात्राओं ने, जनता ने डरना छोड़ दिया है। और तानाशाह को सबसे बड़ा डर यही होता है कि जनता उससे डरना छोड़ दे। जनता अपनी आवाज़ उठाने लगे। जनता अपना हक मांगने लगे। जनता जवाबदेही फिक्स करने लगे।प्रिय पाठकों एक बार उन्हीं महाराजा के राज में अकाल पड़ा। हुआ यह कि जिस देश से अन्न आता था, वहाँ युद्ध छिड़ गया। आने जाने के रास्ते बंद हो गए। जिन गाड़ियों से अन्न आता था, वे जहाँ थीं, वहीं रुक गईं। राज्य में अनाज का संकट पड़ गया। ऐसे में राजा ने अपने राजदरबार की बैठक बुलाई। बैठक वैसे ही शुरू हुई, जैसे शुरू होनी चाहिए थी। सारे राजदरबारी आ गए, नवरत्न भी पधार गए। उसके बाद परम्परा का निर्वाह करते हुए, दरबारी ने हुंकार लगाई- अफगानिस्तान, इंडोनेशिया – मलेशिया रत्न, कैमरून सेशेल्स, पापुआ न्यू गिनी ज्योति, फिजी – गुयाना विभूषण, स्लोवाकिया – भूटान चंदन, रुस – सऊदी अरब – बहरीन – ओमान – यूएई- अमरीकी पाबंद .. गॉब्लेट ऑफ फायर, ऑर्डर ऑफ फीनिक्स,गार्डियन ऑफ गैलेक्सी, पाइरेट ऑफ कैरेबियन, ब्रदर फ्रॉम अदर मदर,जुमलेसुभानी, तमससृष्टा, असत्य वक्ता,…गौतमी मित्र, पठानपुत्र, चौकीदार श्री, श्री 1008, नॉन बायोलॉजिकल, श्री सरेंडरनाथ जी महाराज, मास्टर इन इंटायर पोलिटिकल साइंस, पधार रहे हैं !!!
आत्म प्रसंशा और पुराने राजाओं की फजीहत के बाद राजदरबार का काम शुरू हुआ। अनाज के वज़ीर ने उठ कर कहा, हे राजाओं के राजा, पूरे विश्व के गुरु, समस्या यह है कि देश में अनाज की कमी हो रही है। जिस रास्ते से हमारे यहाँ अनाज आता है, उस रास्ते पर युद्ध के कारण आवागमन बंद है । तो अनाज की, गेहूं, चावल और दालों की कीमत बढ़ा दो, राजा को हर समस्या का उपाय कीमत बढ़ाना लगता था। और राज्य की धर्मभीरू प्रजा भी धार्मिक राजा के हर जुल्म को सहने के लिए तैयार बैठी थी।पर महाराज, उससे अन्न की कमी तो पूरी नहीं होगी। प्रजा खायेगी क्या? अनाज मंत्री ने डरते डरते कहा।राजा कहना चाहता था, मशरूम खा लेगी, बादाम, काजू और अखरोट खा लेगी पर कुछ पुरानी बात सोच कर चुप रहा।एक दूसरे मंत्री ने, जिसका अनाज मंत्रालय से दूर-दूर का कोई संबंध नहीं था और जिसके बेटों ने पत्थर काटने की मशीन लगाई हुई थी, बोला, महाराज की जय हो। महाराज, मेरे मन में एक विचार आया है। क्यों ना हम अनाज में पत्थर मिला दें। पत्थर सस्ता भी होता है और अनाज में मिलाया भी जाता है। मेरे बेटों की पत्थर की फैक्ट्री है। वे ऐसे पत्थर बनाएंगे कि प्रज़ा को अनाज में पत्थर का पता भी नहीं चलेगा।विचार तो अच्छा है पर जरा देखना पत्थर ऐसे हों कि अनाज में ऐसे घुल मिल जाएं जैसे दूध में पानी मिल जाता है। पेट्रोल में एथेनॉल मिल जाती है। किसी को पता भी नहीं चलता है और नुकसान भी भरपूर होता है।,राजा जी ने कहा। वैसे भी हम यह काम प्रजा को बता कर ही करेंगे। प्रजा को ठगने में मजा तभी है जब उसको बता कर ठगा जाए।राजन, हम सबकुछ प्रजा को बता कर ही करेंगे। इसे मिलावट नहीं, सम्मिश्रण का नाम देंगे। सम्मिश्रण मतलब सरकारी मिलावट। जब व्यापारी करे तो मिलावट है, देश का राजा करे तो सम्मिश्रण है। साथ ही प्रजा को समझा भी देंगे कि इससे हानि कम, लाभ ज्यादा है।और उस दिन के बाद प्रजा को पत्थर सम्मिश्रित अनाज मिलने लगा।
— जुनैद मलिक अत्तारी
