मुक्तक/दोहा

दर्द किसी का बाँट लो

दूजे को बदनाम कर, ढूँढे अपना मान।
कीचड़ उछले तो बचे, तेरा कहाँ गुमान।।

आज बुझे इस दीप पर, तुम हँसते हजार।
तेल तुम्हारे दीप में, कितना है विचार?।।

जो दूजों के घाव पर, नमक लगाते लोग।
जब अपने तन पर लगे, भूल गए सब रोग।।

दूजे की दीवार पर, लिखते अपने दोष।
पहले अपने देख घर, भरा पड़ा है रोष।।

जो दूजों की राख पर, महल बनाते आज।
हवा चली तो पूछना, कहाँ गया वह ताज।।

दुखिया के घर दीप क्या, आज रहा तू नोच।
कल की आँधी क्या करे, अपने घर को सोच।।

दूजे की पीड़ा देखकर, मत करना उपहास।
दर्द किसी का बाँट लो, यही मनुज की आस।।

परबत पर जो आग है, मत समझो बेकार।
हवा चली तो एक दिन, पहुँचे अपने द्वार।।

डूब रहे को देखकर, देना अपना हाथ।
कौन कहे किस मोड़ पर, डूबे तेरा साथ।।

सूखे पत्ते देखकर, मत करना अभिमान।
ऋतु बदले तो वृक्ष भी, खो देता सम्मान।।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh