कविता

एक पुरुष

एक पुरुष
हाड़ तोड़ मेहनत से
अपने गालों को
पोपला कर डाला है
नींद गायब है आंखों से
घर का बोझ
कंधे पर लटक रहा है
जैसे खूंटी पर
सामानों से भरा झोला लटक रहा है
आंखों में एक बेबसी है
पर बेटियों को
एक उच्च तालीम देना चाहता है
इसलिए घिसा चप्पल पहन रहा है
बेटों को पढ़ाना चाहता है
एक नई रोशनी भरना चाहता है
इन सपनों के लिए
कई दिन तक आइना नही देखता है
उलझे हुए बाल
होठों पर जमी पपड़ी
एक पुरुष की असलियत है
एक पुरुष ही है
रातभर कुछ सोंचता है
दिनभर मेहनत करके
भविष्य का जुगाड़ करता है
आधी नींद सोकर
परिवार का भविष्य गढ़ता है

— जयचन्द प्रजापति जय’

*जयचन्द प्रजापति

प्रयागराज मो.7880438226 jaychand4455@gmail.com

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