भोजली : अच्छी फसल की मंगल कामना
सावन की रिमझिम फुहारों में, धरा हरियाली ओढ़े,
खेतों की मेड़ों पर जैसे, कोई सपना चुपके से दौड़े।
नागपंचमी पावन बेला, भोजली के रूप निखरता है,
मिट्टी, पानी, बीज संग, जन-मन विश्वास सँवरता है।
“आई भोजली, आई भोजली, सोन-सोन के कलगी,
अबे हमर भोजली देवी के, सोन-सोन के कलगी।”
धान की बालियाँ लहराएँ, अन्न भरे हरेक खलिहान,
किसान माथे शिकन मिटे, खुशियों से भरे किसान।
माई ममता, बहिन स्नेह, भोजली में आकार पाता है,
गाँव की लोक-परंपरा, पीढ़ी से पीढ़ी तक जाता है।
नदियाँ निर्मल, खेत हरे हों, हर आँगन में सुख बरसे,
मेहनत वाले हाथों में, सुनहरी सपनों के फूल झरते।
हे भोजली माता! आशीष दो, धरती का आँचल भरे,
अन्नदाता के जीवन में, समृद्धि का सूरज उगता रहें।
भोजली केवल पर्व नहीं, यह मिट्टी से रिश्ता प्यारा है,
अन्न, प्रेम व लोक-संस्कृति का, ये अमरदीप हमारा है।
— संजय एम तराणेकर
