क्या पहाड़ बूढ़ा हो गया?
जो कल तक था अडिग पहाड़,
वो आज बोझ बन गया,
बदले वक्त के इस दौर में,
बाबा आदम की खोज बन गया,
जिस कंधे पर बैठकर
कभी तुम मेला देखा करते थे,
आज वो कंधा कांप रहा,
तो तुम दूर हटा करते थे,
तुम्हारी एक हंसी की खातिर,
वो सौ-सौ बार मरा होगा,
फट गई थीं बिवाइयां पैर की,
पर वो मीलों चला होगा,
तुम्हें सूट और बूट पहनाकर,
खुद फटे कुरते में जिया,
स्वाभिमान बेचकर अपना,
उसने तुम्हारी फीस का कर्ज दिया,
वो धूप में जला,वो रातों को जागा,
ताकि तुम्हारा कल संवर सके,
तुम बड़े शहर के साहिब बनो,
और दुनिया में तुम्हारा नाम चल सके,
पर आज जब उसकी आंखों का पानी,
थोड़ा सा धुंधलाया है,
तुम्हें उसका कांपता हाथ और बूढ़ा चेहरा,
पुराना सा साया नजर आया है,
जिंदगी भर जो ढाल बना,
हर मुश्किल को हंसकर झेला था,
सोचो जरा उस बूढ़े दिल पर,
आज कैसा अकेलापन फैला था,
मत भूलो कि वो दरख्त पुराना ही,
तुम्हारी जड़ों का आधार है,
पिता कोई बीता हुआ कल नहीं,
वो तुम्हारा पूरा संसार है,
वक्त रहते सम्भाल लो दामन,
यह साया लौटकर नहीं आता,
जो पिता को बोझ समझता है,
वो जीवन में कभी सुखी नहीं रह पाता।
— राजेन्द्र लाहिरी
