हास्य व्यंग – टलुवा वीर
कर्मठ व्यक्तियों के कारनामों से तो इतिहास भरा पड़ा है। काल करे सो आज कर, आज करे अब— ये तो सबने ही बचपन से पचपन तक खूब पढ़ा है। तो आज बात करूंगी टलुवा वीर लोगों की। जिनके शौर्य को हमेशा से नजरअंदाज किया जाता रहा है, किंतु बस अब और नहीं। आखिर टालना भी कोई मामूली कला नहीं है, इसके लिए धैर्य, कल्पनाशक्ति और अद्भुत आत्मविश्वास चाहिए।
आज जो विश्व इतना युद्ध की आग में जल रहा है। अगर ईरान और अमेरिका में टलुवा वीर होते तो ऊपर से आदेश आते ही तुरंत अटैक नहीं करते। पहले फाइल घूमती, फिर मीटिंग होती, फिर दूसरी मीटिंग की तारीख तय होती और तब तक शायद युद्ध करने का उत्साह ही ठंडा पड़ जाता।इस तरह समूचा विश्व इस युद्ध की विभीषिका से बच सकता था।
चीन की जिस लैब से कोरोना पूरे विश्व में फैल गया था, अगर वहां के वैज्ञानिक टलुवा प्रवृत्ति के होते तो कोरोना न फैला होता। कम से कम प्रयोगशाला की फाइल पर ‘कल देखेंगे’ लिखा होता और दुनिया कुछ दिन और चैन की सांस लेती!
ये तो हुए बड़े-बड़े उदाहरण। अब देखते हैं अपने आस-पास के टलुवा वॉरियर्स को।
क्लास में जो बच्चा अपना काम समय से पूरा कर के ले जाता है, टीचर्स भी उसी बच्चे को और नया काम चटका देती हैं। जैसे—बेटा, सबकी नोटबुक जमा कर लो और जो नहीं लाया है उसका नाम नोट कर लेना। अब एक तरफ जहां टलुवा बच्चे नए-नए बहाने बनाकर अपनी कल्पना शक्ति और नाट्यकला को निखार रहे होते हैं, वहीं जिसने होमवर्क कर लिया था उसे अनजाने ही अतिरिक्त काम मिला और मुफ्त में दुश्मन भी मिले, जिनका नाम लिखकर टीचर्स को दिया। अर्थात ईमानदारी का पुरस्कार—अतिरिक्त काम और कुछ नए दुश्मन!
अच्छा, टलुवा बच्चे मां-पिता के भी खूब पैसे बचाते हैं। जैसे मम्मी ने कहा—पप्पू ये काम कर लो तो चॉकलेट दूंगी। न पप्पू करेंगे, न चॉकलेट का खर्चा होगा, न दांत सड़ने का डर। एक टलुवा बच्चा केवल काम ही नहीं टालता, वह पूरे परिवार की अर्थव्यवस्था संभालता है।इस तरह के अनगिनत फायदे हैं, ये तो एक नमूना है।
अब दफ्तरों में टलुवा कर्मचारियों के कारनामों पर एक नजर। जिन्होंने बॉस का काम तुरंत ही खत्म कर दिया, उनको तो बॉस से नया काम भी मिल जाता है। और वहीं हमारे टलुवा वीर लोग एक ही काम को इतना टालते हैं कि ऑफिस में नए लोगों की नियुक्ति करनी ही पड़ती है। देखिए, रोजगार सृजन में भी इनका अप्रत्यक्ष योगदान है!
यहां नोट करने वाली बात ये है कि ये काम से इंकार नहीं करते हैं। बस टाल देते हैं। आज का काम कल और कल का काम परसों। बोलते हैं—इतनी भी क्या जल्दी है, जब जीना है बरसों। काम आज ही क्यों करें, जब कल नाम की इतनी सुंदर सुविधा प्रकृति ने हमें दे रखी है!
टलुवा वीर काम को ही नहीं टालते, जाने-अनजाने उससे उत्पन्न होने वाले संकटों को भी टाल देते हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि समस्या का समाधान करना इनका उद्देश्य ही नहीं, बल्कि समस्या को इतना इंतजार करवाना है कि वह खुद शर्म से चली जाए।
साहब, क्या करें, गलती इनकी भी नहीं है। हमारे समाज में मां-बाप बच्चों के लिए अपनी इच्छाओं को टाल देते हैं। बच्चे के महंगे खिलौनों की फरमाइश को अगले महीने पर टाल देते हैं। मां-बाप की यही टालमटोल कभी बचत बन जाती है और कभी बच्चों के सपनों की किस्त।
और अगर नौजवान बच्चे बूढ़े होते मां-बाप को वृद्धाश्रम भेजने के फैसले को कल पर टाल दें। तो शायद उस ‘कल’ में रिश्तों को बचाने की थोड़ी गुंजाइश बची रहे।
विश्व युद्ध में लिप्त राष्ट्र परमाणु बम के प्रयोग को टाल दें। बहू सास की कड़वी बात को हंस कर टाल दे। कोई गुस्से में उठे हाथ को टाल दे, कोई बदले की भावना को टाल दे और कोई हिंसा का फैसला लेने से पहले बस एक बार कह दे—‘कल देखेंगे।’
बालात्कार के विचार को मन में उठने से पहले टाल दे। किसी स्त्री की ‘ना’ को समझने में एक पल भी देर न हो, लेकिन हिंसा करने का विचार आए तो उसे हमेशा के लिए टाल दिया जाए।
तो आइए, आज से टलुवा वीरों को सिर्फ आलसी समझकर उनका मजाक न उड़ाएं। हर टालना बुरा नहीं होता—कुछ फैसले समय पर न लेना विनाशकारी हो सकता है, लेकिन कुछ फैसलों को टाल देना भी इंसानियत बचा सकता है।
जय हो टलुवा वीर जवानों की!
— प्रज्ञा पाण्डेय मनु
