दूसरों की चमकती जिंदगी में खुद को तलाशते बच्चे
बचपन कभी चीजों का हिसाब नहीं रखता था; अब उसे सिखाया जा रहा है कि उसकी पहचान भी चीजों से बनती है। किसके पास महँगा फोन है, किसके कपड़े बेहतर हैं, कौन कहाँ घूमकर आया, किसके घर में कैसी सुविधा है—तुलना की यह दौड़ बच्चों के मन तक पहुँच गई है। स्क्रीन पर हर ओर चमकता जीवन दिखाई देता है—महँगे फोन, कपड़े, कारें, यात्राएँ, पार्टियाँ, शानदार घर और मुस्कुराते चेहरे। धीरे-धीरे बच्चा मानने लगता है कि सुख वही है जो दूसरों के पास है और वह तभी महत्वपूर्ण है, जब उसके पास भी वैसा ही जीवन हो। यहीं से कमी वस्तुओं में नहीं, मन में पैदा होने लगती है।
अब बच्चे अपने जीवन को अपनी आँखों से कम, दूसरों की दिखाई हुई जिंदगी से अधिक देखने लगे हैं। कभी तुलना पड़ोस तक थी, आज पूरी दुनिया उनके सामने है। सोशल मीडिया का अदृश्य आईना हर दूसरे व्यक्ति को अधिक सुंदर, सफल और खुश दिखाता है। फिर मन पूछता है—“उसके पास यह है, मेरे पास क्यों नहीं?” माता-पिता की आर्थिक क्षमता जहाँ इच्छाओं की सीमा तय करती है, इंटरनेट वहाँ कोई सीमा नहीं छोड़ता। धीरे-धीरे किसी चीज का अभाव बच्चे को अपने भीतर का अभाव लगने लगता है; उसे लगता है कि वह पीछे है, कम है, अधूरा है। जबकि सच यह है कि बच्चे की कीमत उसके जूते, फोन, कपड़ों या घर की कीमत से नहीं आँकी जा सकती।
स्क्रीन की दुनिया बच्चे को केवल दृश्य नहीं देती, वह उसके मन के लिए नए पैमाने भी गढ़ती है। साइबर बुलिंग के ताने, उपहास और अपमान स्क्रीन पर खत्म नहीं होते; वे भीतर उतरकर आत्मविश्वास को चोट पहुँचाते हैं। फिल्टर और संपादित तस्वीरें चेहरे और शरीर की ऐसी कृत्रिम कसौटी बनाती हैं, जिस पर लड़के-लड़कियाँ अपने वास्तविक रूप को तौलने लगते हैं। ऑनलाइन गेमिंग और लगातार स्क्रीन से जुड़े रहना नींद, एकाग्रता और दिनचर्या को प्रभावित कर सकता है। आभासी दुनिया की जीत में डूबा बच्चा धीरे-धीरे उस वास्तविक दुनिया से दूर होने लगता है, जहाँ उसके रिश्ते, सपने और जीवन सचमुच मौजूद हैं।
एक बच्चे के भविष्य पर फैसला सुनाने के लिए हमने एक प्रश्नपत्र को इतनी ताकत दे दी है कि उसके सामने बचपन, सपने और संभावनाएँ छोटे पड़ने लगे हैं। कोचिंग की भीड़, रैंक की होड़, अंकों का दबाव और माता-पिता की अपेक्षाएँ असफलता को सामान्य पड़ाव नहीं, अंतिम फैसला बना देती हैं। कोटा जैसे शहरों की घटनाएँ इस संकट का कठोर चेहरा दिखाती हैं। हमें पूछना होगा—भविष्य की तैयारी के नाम पर कहीं हमने बच्चों का वर्तमान और बचपन तो नहीं छीन लिया? परीक्षा केवल योग्यता की कसौटी है, जिंदगी की नहीं। एक परिणाम किसी सपने की राह बदल सकता है, लेकिन किसी बच्चे की संभावनाओं पर पूर्णविराम नहीं लगा सकता।
घर में दरवाजे होते हैं, पर बच्चों के मन के दरवाजे धीरे-धीरे बंद हो जाएँ तो कोई आवाज सुनाई नहीं देती। माता-पिता काम में, बच्चे स्कूल और कोचिंग में—एक ही छत के नीचे रहते हुए भी सब अपनी-अपनी दुनिया में सिमटते जाते हैं। कभी परिवार साथ बैठकर खाना खाता और बातें करता था; अब कई बार संवाद संदेशों में रह गया है। माता-पिता पूछते हैं—“क्या हुआ?” बच्चा कहता है—“कुछ नहीं।” इस “कुछ नहीं” को सुनना जरूरी है। बच्चों को हर बार समाधान नहीं चाहिए; कई बार उन्हें बस ऐसा अपना चाहिए, जो बिना टोके, बिना परखे उनकी बात सुन ले। उन्हें यह भरोसा चाहिए कि घर वह जगह है जहाँ वे सफलता ही नहीं, अपनी हार, डर और कमजोरी लेकर भी लौट सकते हैं।
बच्चे के कंधों पर आज बस्ते के साथ आने वाले कल का डर भी है। एआई नौकरियाँ बदल देगा तो हमारा क्या होगा? बढ़ती महँगाई, जलवायु संकट और बदलती दुनिया के सवाल उनके मन में भय भर रहे हैं। इस डर में वे परिवार से दूर होने लगते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि बड़े उनकी दुनिया समझ नहीं सकते। यह दूरी टूटनी चाहिए। माता-पिता को हर सवाल का जवाब नहीं, बच्चे के पास बैठना जरूरी है। सलाह बाद में, पहले हाथ थामा जा सकता है। शिक्षक, अभिभावक और समाज बच्चे के व्यवहार में आए गंभीर बदलावों को अनदेखा न करें। जरूरत हो तो भरोसेमंद वयस्क या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेना कमजोरी नहीं, जिम्मेदारी है।
दूसरों की रोशनी में अपना चेहरा मत तलाशो। स्क्रीन पर दिखने वाली जिंदगी पूरी जिंदगी नहीं होती; वहाँ दिखाई देने वाली चमक तुम्हारी रोशनी कम नहीं करती। किसी के अधिक अंक तुम्हारा मूल्य नहीं घटाते, न किसी की महँगी चीजें तुम्हारे जीवन को छोटा बनाती हैं। सोशल मीडिया से थोड़ा दूर हटो; प्रकृति, किताब, खेल, संगीत या चित्रकारी जैसे कामों में लौटो—ऐसे काम, जिनमें किसी को प्रभावित करने की जरूरत न हो। और जब मन में तूफान उठे, चुप मत रहो। माँ-पिता, शिक्षक, रिश्तेदार या किसी भरोसेमंद व्यक्ति से कहो—“मैं ठीक महसूस नहीं कर रहा हूँ।” यह कमजोरी नहीं, अपने जीवन के पक्ष में उठाया गया साहस है।
बच्चों को आगे बढ़ाना जरूरी है, लेकिन पहले उन्हें भरोसा दें कि पीछे रह जाने पर भी वे हमारे अपने हैं। फोन पुराने होंगे, फैशन बदलेंगे, अंक भूल जाएंगे और लाइक्स का शोर थम जाएगा; मगर आत्मसम्मान और रिश्ते साथ रहेंगे। बच्चे से यह मत कहिए कि वह तभी खास है जब जीते; उसे कहिए—हार में भी उसकी जगह हमारे दिल में उतनी ही है। वह किसी ब्रांड, नंबर या स्क्रीन से बड़ा है। जिंदगी की असली जीत दुनिया की नजर में बड़ा दिखना नहीं, अपनी नजर में खुद को छोटा न होने देना है। और बच्चों, अगर कभी अँधेरा लगे, तो उसे अंतिम सच मत मानना। रात के बाद सुबह होती है। चुप मत रहना—बोलना, किसी भरोसेमंद इंसान का हाथ थामना और जरूरत हो तो मदद माँगना।
— कृति आरके जैन
