कविता

थुक चांट के महिमा

दिन रात मोबाइल म लगे हें,
बाबू अउ नोनी मन,
रील्स बना के नाचत गावत,
भुलगे हें सब पढ़ई लिखई के धन,
गली-खोर म रेंगत हें अइसने,
जइसने कोनो बरात,
सियनहा मन देख के कहिथें,
आजकाल के गोठ बात,
कुकुर कस किंदर खेल कुद अउ नाच,
जिनगी म कुछु करना हे त चल थुक अउ चांट,
नेता जी ह चुनाव के पहिली,
मारत राहय बड़े डिंडाल,
भरस्टाचारी मन ला जेल भेजहूं,
बदल दूहूं गाँव के हाल,
जीत के गिस त कुर्सी म बइठके,
बदल गे ओकर बात,
अपन कहे सब बात ला चाटिस,
जनता देखत रहिगे दांत,
लाज सरम सब बेंच के खागे,
पहिर के उज्जर खादी,
अब कहिथे थुक के चाटे बिना,
कभू नइ होवय परगती,
बाबू मन के केबिन म जाबो,
त फाइल मन हा नाचथे,
बिना चाय पानी के भाई,
कोनो काम नइ बांचथे,
सोझ मनखे ह चक्कर मारथे,
कुकुर कस एती ओती,
चश्मा लगा के साहब कहिथे,
काबर गंवावत हस धोती,
जउन ह जाके गोड़ ला चूमिस,
ओकर काम ह झटपट होगे,
जेकर तीर नइ हे थुक चांट के कला,
ओकर करम ह सोगे,
त सुन ले संगी नवा जमाना के,
इही आय मूल गियान,
सिधवा रहिबे त दुनिया तुहर,
खींच लेही परान,
गरब ला थुक के चाट लेबे,
त मिलही ऊंचा पद,
खेल कूद अउ नाच ला छोड़ के,
सीख ले इही सरहद।

— नम्मू पामगढ़िया

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

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