इश्क़, प्यार और मोहब्बत का रूहानी सफ़र
इश्क़, प्यार और मोहब्बत,ये महज़ अल्फ़ाज़ नहीं, बल्कि इंसानी ताल्लुक़ात और एहसासात का वो हसीन समंदर हैं जिसकी गहराई को नापना नामुमकिन है। यह एक ऐसा पाक जज़्बा है जो इंसान को उसकी ख़ुदग़र्ज़ी से आज़ाद कराकर तसलीम (समर्पण) और वफ़ा की राह दिखाता है।
देखना (नज़र-ए-इल्तिफ़ात),यह किसी भी ताल्लुक़ की इब्तिदा (शुरुआत) है, जहाँ पहली नज़र किसी पर ठहरती है और दिल में तवज्जो व कशिश का सिलसिला शुरू होता है।अच्छा लगना (पसंद व उल्फ़त),जब ज़ाहिरी ख़ूबसूरती से आगे बढ़कर किसी की शख़्सियत, बातें और सादगी दिल को छू जाती हैं तथा उसकी मौजूदगी से रूह को सुकून मिलने लगता है।
चाहना (तड़प व तमन्ना), यह दिल की वह संजीदा हालत है जहाँ इंसान महबूब के साथ की आरज़ू करने लगता है, उसकी ख़ुशी ही अपनी ख़ुशी बन जाती है और उसके साथ हर लम्हा गुज़ारने की तड़प पैदा होती है।
पाना (विसाल व क़ुरबत), यह दो दिलों का एक हो जाना और एक-दूसरे को अपनी ज़िंदगी का हक़ीक़ी हिस्सा बना लेने का मरहला (पड़ाव) है।
शुरुआती चार सीढ़ियों की सहूलियत किसी की तरफ़ माइल (आकर्षित) होना, उसे पसंद करना, उसकी चाहत रखना और उसे हासिल कर लेना इंसानी जज़्बात का एक क़ुदरती और आसान बहाव है, जिसमें कोई ख़ास बलिदान या जद्दोजहद की ज़रूरत नहीं पड़ती।
निभाना (सबसे कठिन और आख़िरी सीढ़ी), असली इश्क़, प्यार और मोहब्बत महज़ हासिल कर लेने में नहीं, बल्कि ता-उम्र उस ताल्लुक़ की एहतराम (इज़्ज़त) और हुरमत को क़ायम रखने में है; यही इश्क़ का असल इम्तिहान है।
निभाने की हक़ीक़त,वक़्त के बदलने, मुश्किल हालात और ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव के बावजूद किसी का हाथ पूरी पाकीज़गी, वफ़ादारी और शिद्दत के साथ थामे रखना ही सच्चा प्यार है।
कमियों से दरगुज़र, इंसान ख़ताओं का पुतला है, इसलिए महबूब की ख़ामियों को नज़रअंदाज़ करके ,उसकी कमियों के साथ उसे दिल से स्वीकार करना ही सच्ची रफ़ाक़त (साथ) है। मुहब्बत है।
तसलीम और अना (अहंकार) का ख़ात्मा, मोहब्बत कभी मालिकाना हक़ या क़ब्ज़ा नहीं जताती, बल्कि यह इंसान को उसकी ख़ुदग़र्ज़ी से आज़ाद कराकर तसलीम और वफ़ा की राह दिखाती है।
ता-उम्र का सफ़र,आख़िरी साँस तक अपनी वफ़ा पर क़ायम रहना, एक-दूसरे की ढाल बनना और हर मोड़ पर रिश्ते की पाकीज़गी को बचाए रखना ही इश्क़ की हक़ीक़ी ताबीर (अर्थ) है।
इश्क़ सिर्फ़ किसी को पा लेने का नाम नहीं, बल्कि ता-उम्र एहतराम, वफ़ादारी और शिद्दत के साथ उस रिश्ते की हुरमत को निभाते रहने का एक रूहानी सफ़र है।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
