ब्यूरोक्रेसी छोड़ दिव्या बदलने चली यूपी की राजनीति
उत्तर प्रदेश की नौकरशाही में इन दिनों एक ही नाम सिविल सर्विस छोड़कर नेतानगरी में उतरने वाली दिव्या मित्तल की चर्चा हो रही है। एक महीने पहले इस्तीफा देकर सबको चौंकाने वाली 2013 बैच की तेजतर्रार आईएएस अधिकारी 29 सितंबर की सुबह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर करीब दस मिनट के वीडियो के साथ सबके सामने आईं। उन्होंने अब तक की अटकलों पर विराम लगाते हुए साफ कहा कि वह राजनीति में उतरेंगी और उत्तर प्रदेश में ही रहेंगी। वीडियो की सबसे अहम बात यह रही कि दिव्या ने किसी राजनीतिक दल में शामिल होने का ऐलान नहीं किया। उन्होंने कहा कि वह जनता के साथ मिलकर ऐसा मंच खड़ा करना चाहती हैं जो किसी से डरे नहीं। उनके अनुसार राजनीति उनके लिए किसी पद तक पहुंचने का जरिया नहीं होगी। वह उन लोगों की आवाज बनना चाहती हैं जिनकी बात सरकारी दफ्तरों तक नहीं पहुंच पाती। सरकार और नौकरशाही पर उनके तीखे सवालों ने संकेत दिया कि वह सत्ता पक्ष के खिलाफ मुखर रहेंगी। वीडियो में उन्होंने अपना फोन और व्हाट्सऐप नंबर भी साझा किया और सहमत लोगों से जुड़ने की अपील की।बहरहाल, दिव्या का सफर अपने आप में दिलचस्प है। दिल्ली में जन्मी और मूल रूप से हरियाणा के रेवाड़ी से जुड़ी दिव्या ने आईआईटी दिल्ली से बीटेक और आईआईएम बेंगलुरु से एमबीए किया। लंदन में नौकरी के बाद वह भारत लौटीं, सिविल सेवा परीक्षा पास की और यूपी कैडर मिला। मेरठ में संयुक्त मजिस्ट्रेट से शुरू हुए करियर में वह गौतमबुद्ध नगर की सीडीओ रहीं और संतकबीरनगर, मिर्जापुर और देवरिया की जिलाधिकारी भी। उनका इस्तीफा 30 अगस्त को घोषित हुआ और 15 सितंबर से प्रभावी हुआ। आधिकारिक कारण निजी और पारिवारिक बताए गए, लेकिन ब्यूरोक्रेसी में माना गया कि देवरिया के डीएम पद से हटाकर राजस्व परिषद में सचिव बनाए जाने की टीस इसके पीछे बड़ा कारण रही। फील्ड में सक्रिय रहने वाले अफसर के लिए यह तबादला किनारे लगाए जाने जैसा माना जाता है। दिव्या की गिनती मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के भरोसेमंद अफसरों में होती रही है, इसलिए अब उनके सरकार पर सवाल उठाने को दिलचस्प मोड़ माना जा रहा है।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी से उनकी कथित मुलाकात को लेकर भी कयास हैं। पर वीडियो में उन्होंने किसी दल का नाम नहीं लिया, इसलिए फिलहाल ये अटकलें ही हैं। कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि वह 2027 का विधानसभा चुनाव देवरिया या मिर्जापुर से लड़ सकती हैं, पर इसकी पुष्टि उनकी ओर से नहीं हुई है। उनके पति गगनदीप सिंह भी भारतीय व्यापार सेवा के अधिकारी रहे हैं और 2022 में इस्तीफा दे चुके हैं। वैसे यूपी की राजनीति में किसी नौकरशाह ने पहली बार दस्तक नहीं दी है। कई आईएएस ने राजनीति का दामन पकड़ा, कुछ थोड़े दिन चमके तो कुछ का सितारा कभी चमक नहीं पाया।सबसे सफल उदाहरण पूर्व आईएएस और अब योगी कैबिनेट में ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा का है। वह मूल रूप से मऊ के हैं, पर उनका कैडर गुजरात था। 1988 बैच के इस अधिकारी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ गुजरात से पीएमओ तक करीब दो दशक काम किया। जनवरी 2021 में एमएसएमई सचिव पद से वीआरएस लेकर वह भाजपा में आए, विधान परिषद पहुंचे और आज योगी सरकार में नगर विकास व ऊर्जा जैसे भारी विभागों के कैबिनेट मंत्री हैं। उनकी सफलता में शीर्ष नेतृत्व का भरोसा और सत्ता की छत्रछाया निर्णायक रही।इसी तरह आईपीएस और कानपुर के पहले पुलिस कमिश्नर असीम अरुण ने 2022 के चुनाव से ठीक पहले वीआरएस लिया, भाजपा से कन्नौज सदर जीते और आज राज्य सरकार में समाज कल्याण के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) हैं। पूर्व डीजीपी बृजलाल भाजपा से जुड़कर राज्य अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग के अध्यक्ष बने और अब राज्यसभा सांसद हैं। दोनों आईपीएस हैं।अन्य आईएएस अधिकारियों की बात की जाए तो लखनऊ विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष रहे राम बहादुर ने सेवानिवृत्ति के बाद बसपा के टिकट पर मोहनलालगंज से चुनाव लड़ा और बाद में भाजपा का रुख किया। कुंवर फतेह बहादुर सिंह, जो 2009 से 2017 तक प्रमुख सचिव (गृह) और मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव जैसे शक्तिशाली पदों पर रहे, रिटायरमेंट के बाद बसपा से जुड़े। इनके अलावा पी.एल. पुनिया का नाम अहम है। यूपी कैडर के इस पूर्व आईएएस ने कांग्रेस से बाराबंकी का प्रतिनिधित्व किया और अब उनके बेटे तनुज पुनिया वहीं से कांग्रेस सांसद हैं।
इन अधिकारियों की राजनीतिक पारी का विश्लेषण करें तो तीन बातें साफ दिखती हैं। पहली, जिन अफसरों ने सत्ताधारी दल का दामन थामा, वे अपेक्षाकृत सुरक्षित और सफल रहे, क्योंकि उन्हें संगठन, संसाधन और मंच तीनों मिले। दूसरी, विपक्षी दलों या बसपा जैसे दलों के साथ गए अफसरों को वैसी चमक नहीं मिली, और वे अक्सर नेतृत्व के लिए सजावटी चेहरे बनकर रह गए। तीसरी, ज्यादातर वही लोग सफल हुए जिन्होंने चुनाव से पहले सोच-समझकर वीआरएस लिया और किसी स्थापित दल के साथ ठोस भूमिका तय कर ली। स्वतंत्र मंच बनाकर अकेले उतरने का प्रयोग यूपी में लगभग नहीं दिखता।दिव्या का रास्ता इसी वजह से अलग और कठिन है। उत्तर प्रदेश की राजनीति जाति समीकरण, बूथ स्तर के संगठन, पैसे और स्थानीय दबदबे से चलती है, जबकि दिव्या के पास इनमें से कोई पारंपरिक सहारा नहीं है। वीडियो में उन्होंने इन्हीं मुद्दों पर, यानी पैसा, बाहुबल और जातीय समीकरण, अपनी बात रखी है और साफ किया कि उनकी राजनीति इनसे अलग होगी। यह आदर्शवादी सुनाई देता है, पर व्यवहार में इसकी कठिन परीक्षा होनी है। उनके पक्ष में जो बातें जाती हैं, वे हैं साफ-सुथरी और कर्मठ अफसर की छवि, पढ़ी-लिखी शहरी पहचान और सोशल मीडिया पर सक्रिय समर्थन। पर 2027 के विधानसभा चुनाव में समय कम है और मैदान में सपा, भाजपा, कांग्रेस और बसपा जैसी संगठित ताकतें हैं।अब देखना यह है कि वह अपना मंच किस तरह खड़ा करती हैं, चुनाव लड़ती हैं या किसी दल के साथ गठजोड़ करती हैं। ब्यूरोक्रेसी में हलचल इसलिए भी है कि यह पहला मामला नहीं जब किसी अफसर ने सत्ता से दूरी बनाई हो, पर बिना किसी दल के खुली चुनौती देने वाला मामला जरूर दुर्लभ है। दिव्या मित्तल की यह पारी या तो यूपी में नौकरशाही से राजनीति के रास्ते का नया अध्याय बनेगी, या उन उदाहरणों की सूची में जुड़ेगी जो बताते हैं कि यहां सत्ता के बिना सियासत आसान नहीं।
— अजय कुमार
