मौत का जाम
सागर की धरती रो पड़ी, आँखों में है नमी,
किसने घोला ज़हर, बाँटी हैं मौत की ग़मी?
जाम समझ बढ़े, “जिंदगी” हाथ से छूट गई,
घर की चौखट सूनी, लाखों उम्मीदें टूट गईं।
वो किसके लाल ग्यारह, बहुतों के थे सहारे,
हर माँ की आँखें पूछ रहीं, कहाँ मेरे दुलारे?
शराब नहीं, ये ज़हर था, घर-घर शोक दिया,
लालच की आँधी ने घर संसार झोंक दिया।
सात दुकानों पे ताले, सवाल अभी बाकी है,
कानून की चौखट पे जवाबदेही की बारी है।
कितना बिकता रहेगा ज़हर, यूं घर उजड़ेंगे?
चंद सिक्कों की खातिर इंसानियत से लड़ेंगे?
ऐसा समाज बनाएंगे, जीवन सबसे प्यारा हो,
यूं नशे के अंधियारे में मानवता उजियारा हो।
ग्यारह दीप बुझ गए, सिर्फ ये संदेश छोड़ गए,
जिंदगी अनमोल है, इसे जाम में ना खोने दो।
(संदर्भ – जहरीली शराब ने ली 11 जानें।)
— संजय एम तराणेकर
