कविता

क्यों है

वो जो गैर है तो लगता इतना अपना क्यों है
गर अपना है तो फिर वो तन्हा-तन्हा क्यों है।
उसके आने से आती है रौनक चेहरे पर मेरे
आख़िर ये राज़ फिर उसको कहना क्यों है।
खुद मुस्कुराहट गुजरती है छूकर लबों को उसके
फिर उदासियों का लिबास उसने पहना क्यों है।
शायद जिसको मेरी आरज़ू भी नहीं है
फिर मुझको उसका तलबगार रहना क्यों है।
यादों का सैलाब उमड़ता जब-जब
फिर मुझको दूर तलक बहना क्यों है।
जब उसकी आँखों में दिखता है अक्सर मुझे खुद का
फिर आईना देख मुझको सँवरना क्यों है।
मुनासिब नहीं है उसका मिलना मुझसे
तो फिर हर मोड़ पे उसके लिए ठहरना क्यों है।
मुमकिन नहीं तो वादा न कर मुलाक़ात का
फिर हर रोज़ तेरा वादों से मुकरना क्यों है।
फूल हूँ, खुशबू ये तो रवायत है मेरी
फिर टूटकर डाल से बिखरना क्यों है।

— प्रज्ञा पांडेय

*प्रज्ञा पाण्डेय 'मनु'

वापी़, गुजरात

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