नई भोर
ढलता सूरज कह गया, होना नहीं निराश।
रात ढले फिर भोर है, लेकर नया प्रकाश॥
जीवन में सुख-दुख सदा, आते रहते साथ।
धीरज रखकर जो चले, लगती मंजिल हाथ॥
टूटे सपनों को मिले, फिर से नव-आकाश—
रात ढले फिर भोर है, लेकर नया प्रकाश॥
पतझड़ चाहे छीन ले, पत्तों का संसार।
सूनी डाली पर खिले, फिर से फूल हजार॥
ऋतुएँ बदलें देखकर, रखना मन में आस—
रात ढले फिर भोर है, लेकर नया प्रकाश॥
हार मिले तो सीख लो, जीत मिले तो मान।
कर्म-पथों पर बढ़ चलो, यही सफलता-ज्ञान॥
मेहनत से लिखता समय, जीवन का इतिहास—
रात ढले फिर भोर है, लेकर नया प्रकाश॥
बादल चाहे घेर लें, ढक जाए आकाश।
सूरज अपनी राह में, करता सदा उजास॥
कितनी भी मुश्किल पड़े, मत खोना विश्वास—
रात ढले फिर भोर है, लेकर नया प्रकाश॥
‘सौरभ’ मन में आस रख, मत होना कमजोरह
छिपी अंत के गर्भ में, नव-उदय लिए भोर॥
आज अगर है रात तो, कल होगा उल्लास—
ढलता सूरज कह गया, होना नहीं निराश।
रात ढले फिर भोर है, लेकर नया प्रकाश॥
— डॉ. प्रियंका सौरभ
