कविता

हिन्दी का गौरवशाली इतिहास

बावन गढ़ों का समूह है हमारा,
प्रकृति की चंचलता नभ का तारा।
देश की आन-बान शान का नारा,
पूछती हूं कौन सा पथ नहीं हमारा।।

वर्णमाला की यह श्रृंगार शाला,
नव रसों से भरी यह रूप धारा।
तेंतीस मोतियों की कर्म माला,
पूछती हूं कौन सी नहीं वह धारा।।

‌‌ साहित्य का अटूट संगम हमारा,
इतिहास का वो गौरव तुम्हारा।
स्वाभिमान की मणिरत्न हूं मैं,
पूछती हूं कौन सा पर्वत नहीं हमारा।।

अन्तस्थ की स्मृतियों का उजाला,
भावों की बहती वो अविरल धारा।
शब्दकोश की मोतियों की माला,
पूछती हूं कौन सा वाक्य नहीं हमारा।।

चन्द्र बिन्दु का अद्भुत प्रकाश हमारा,
नभ में तारों सा चन्द्र हार है हमारा।
सहस्त्र रश्मि किरणों की मधुशाला,
पूछती हूं कौन सा केन्द्र बिन्दु नहीं हमारा।।

— सन्तोषी किमोठी वशिष्ठ “सहजा”

सन्तोषी किमोठी वशिष्ठ

स्नातकोत्तर (हिन्दी)

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