राजनीति

बाढ़ की विभीषिका में जनमानस की अहमियत और बढ़ती ताकत

बिहार की धरती पर बाढ़ केवल पानी के फैलाव की एक प्राकृतिक घटना नहीं है; यह प्रकृति, नदियों, वर्षा, गाद, तटबंधों, जलनिकासी, खेती, आवास, रोजगार, पशुधन और मानवीय जीवन के बीच बिगड़ते संतुलन की ऐसी गंभीर चुनौती है, जिसकी सबसे अधिक कीमत उस सामान्य जनमानस को चुकानी पड़ती है, जो सीमित साधनों में अपने परिवार और भविष्य को सँवारने का निरंतर प्रयास करता है। जब नदी का पानी अपने किनारों को पार करके गाँवों, खेतों, सड़कों और बस्तियों में प्रवेश करता है, तब वह केवल भूमि को जलमग्न नहीं करता, बल्कि किसी किसान की महीनों की मेहनत, किसी मजदूर की आजीविका, किसी छोटे दुकानदार की पूँजी, किसी परिवार का आशियाना, बच्चों की पढ़ाई और पशुओं के जीवन तक को संकट में डाल देता है। बाढ़ के दिनों में सबसे बड़ा प्रश्न केवल पानी की ऊँचाई का नहीं होता, बल्कि मनुष्य की सुरक्षा, भोजन, स्वच्छ पेयजल, औषधि, ईंधन, आश्रय और सम्मानजनक जीवन का होता है। ऐसे समय में समाज का मानवीय चेहरा सामने आता है। कोई अपने घर का अनाज निकालकर पड़ोसी के लिए भोजन बनाता है, कोई नाव लेकर फँसे लोगों तक पहुँचता है, कोई स्वच्छ पानी उपलब्ध कराता है, कोई गैस और ईंधन की व्यवस्था करता है, कोई राशन, वस्त्र और औषधि पहुँचाता है, कोई बच्चों और वृद्धों को सुरक्षित स्थान तक ले जाता है और कोई अपने निजी संसाधनों को सार्वजनिक सेवा के लिए समर्पित कर देता है। यही वह क्षण है जब जनमानस की वास्तविक ताकत दिखाई देती है। संकट मनुष्य को बाँटता नहीं, बल्कि सही दिशा में प्रयास होने पर उसे जोड़ता है। बिहार की बाढ़ ने बार-बार यह प्रमाणित किया है कि शासन की संस्थागत शक्ति के साथ समाज की संवेदना और सहयोग की शक्ति जुड़ जाए तो राहत कार्य अधिक व्यापक और प्रभावी हो सकता है। इस महाविभीषिका में पटना के जनप्रिय शिक्षकों की भूमिका का उल्लेख भी स्वाभाविक रूप से आवश्यक हो जाता है। खान सर, रोशन आनंद सर, एस.के. झा सर और अलख पांडेय सर जैसे शिक्षकों का प्रभाव विद्यार्थियों और युवाओं के बड़े वर्ग तक है। ऐसे समय में उनकी भूमिका केवल कक्षा और शिक्षा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि जनजागरूकता, सामाजिक उत्तरदायित्व और मानवीय संवेदना को सक्रिय करने तक विस्तृत हो सकती है। बाढ़ पीड़ितों के लिए भोजन, स्वच्छ पानी, राशन, गैस और ईंधन, औषधि, वस्त्र तथा अन्य आवश्यक सामग्री की जरूरत को समाज तक पहुँचाना और लोगों को सहायता के लिए प्रेरित करना संकट की घड़ी में महत्वपूर्ण सामाजिक सहयोग बन सकता है। इन शिक्षकों की सबसे बड़ी शक्ति उनके साथ जुड़े विद्यार्थियों और युवाओं का व्यापक समुदाय है। यदि इस शक्ति को सत्यापित सूचना, राहत-सहयोग और सेवा की भावना से जोड़ा जाए, तो हजारों युवा स्वयंसेवी भूमिका में सामने आ सकते हैं। ऐसे प्रयासों का महत्व केवल वितरित की गई सामग्री से नहीं, बल्कि उस भरोसे से भी आँका जाना चाहिए जो संकटग्रस्त व्यक्ति के भीतर पैदा होता है कि वह अकेला नहीं है। यही मानवीय मूल्य किसी समाज की वास्तविक समृद्धि का परिचायक हैं। धन, भवन और साधन किसी समाज को बड़ा बना सकते हैं, लेकिन संवेदना ही उसे सभ्य बनाती है।

इस महाविभीषिका में पटना के इन शिक्षकों की सामाजिक भूमिका को केवल राहत सामग्री के वितरण के संदर्भ में देखना पर्याप्त नहीं होगा। शिक्षा का वास्तविक प्रभाव तब दिखाई देता है जब ज्ञान समाज के कठिन समय में उपयोगी बनता है। खान सर, रोशन आनंद सर, एस.के. झा सर और अलख पांडेय सर जैसे शिक्षकों की जनसंपर्क क्षमता विद्यार्थियों और युवाओं को सही दिशा में संगठित करने में उपयोगी हो सकती है। यदि बाढ़ के समय किसी क्षेत्र में भोजन की आवश्यकता है, कहीं स्वच्छ पानी की कमी है, कहीं औषधि चाहिए, कहीं गैस या ईंधन की आवश्यकता है और कहीं विस्थापित परिवारों के लिए आश्रय की जरूरत है, तो ऐसी आवश्यकताओं की विश्वसनीय जानकारी समाज तक पहुँचाना स्वयं एक महत्वपूर्ण सेवा है। इसी प्रकार अफवाहों और अपुष्ट सूचनाओं से बचाने के लिए सत्यापित जानकारी का प्रसार भी आवश्यक है। संकट के समय जनभावना बहुत तीव्र होती है; इसलिए प्रभावशाली लोगों की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है कि वे समाज को संयम, सहयोग और तथ्यपरक सूचना की दिशा में प्रेरित करें। शिक्षकों की सबसे बड़ी पूँजी केवल उनका ज्ञान नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के साथ उनका विश्वास का संबंध है। एक शिक्षक यदि अपने विद्यार्थियों से कहता है कि बाढ़ पीड़ितों के लिए अपने सामर्थ्य के अनुसार भोजन, पानी, राशन, दवा या अन्य आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध कराएँ, तो उसके पीछे केवल सहायता का संदेश नहीं होता; वह विद्यार्थियों को नागरिक उत्तरदायित्व का वास्तविक पाठ पढ़ा रहा होता है। यदि विद्यार्थी समूह बनाकर राहत शिविरों में सहायता करें, स्थानीय स्तर पर जरूरतमंद परिवारों की जानकारी एकत्र करें, वृद्धों और बच्चों की सहायता करें या प्रशासन द्वारा चलाए जा रहे राहत प्रयासों में सहयोग करें, तो शिक्षा का सामाजिक रूप सामने आता है। यही मानवीय शिक्षा है। पुस्तकों में मानवता पढ़ना एक बात है और बाढ़ के पानी में फँसे किसी अनजान परिवार के लिए भोजन लेकर पहुँचना दूसरी बात। दूसरी स्थिति में ज्ञान आचरण बन जाता है। यही कारण है कि इस बाढ़ की विभीषिका में पटना के इन शिक्षकों का उल्लेख जनमानस की बढ़ती ताकत और मानवीय संवेदनाओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। शासन के पास व्यापक संसाधन और प्रशासनिक तंत्र है, जबकि समाज के पास स्थानीय जानकारी, मानवीय संवेदना और त्वरित सहयोग की शक्ति है। दोनों के बीच समन्वय स्थापित होने पर आपदा प्रबंधन अधिक प्रभावी हो सकता है।

लेकिन प्रत्येक वर्ष राहत बाँटकर बाढ़ की समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया जा सकता। राहत जीवन बचाती है, पर स्थायी व्यवस्था जीवन को बार-बार उसी संकट में जाने से रोकती है। यदि कोई क्षेत्र हर वर्ष या बार-बार बाढ़ की चपेट में आता है, तो केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि इस वर्ष बहुत अधिक वर्षा हुई। हमें यह भी समझना होगा कि पानी कहाँ से आया, किस मार्ग से आया, कहाँ रुका, उसकी निकासी कहाँ बाधित हुई और नदी की जलधारण तथा प्रवाह क्षमता किस प्रकार प्रभावित हुई। बिहार की बाढ़ अनेक परस्पर जुड़े कारणों का परिणाम है—अत्यधिक वर्षा, नदियों में अचानक बढ़ता जलप्रवाह, हिमालयी और पहाड़ी क्षेत्रों से आने वाला पानी, नदी-तल में जमा गाद, तटबंधों की स्थिति, प्राकृतिक जलनिकासी मार्गों का अवरोध, जलग्रहण क्षेत्रों में मिट्टी का कटाव, वनों की कमी, अतिक्रमण और अनियोजित निर्माण। इसलिए समाधान भी बहुआयामी होना चाहिए। आवश्यकता ऐसी व्यापक जल-व्यवस्था की है जो किसी एक नदी या किसी एक जिले तक सीमित न हो, बल्कि पूरे नदी-घाटी तंत्र को एक इकाई के रूप में समझे। जहाँ वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और सामाजिक दृष्टि से उचित हो, वहाँ नदियों को जोड़ने की संभावनाओं का गंभीर अध्ययन किया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य केवल एक नदी का पानी दूसरी नदी में डालना नहीं होना चाहिए, बल्कि जल की अधिकता और कमी के बीच संतुलन स्थापित करना होना चाहिए। जिन क्षेत्रों में अत्यधिक जल आता है, वहाँ उसके सुरक्षित संचयन, नियंत्रित प्रवाह और आवश्यकता के अनुसार उपयोग की संभावनाएँ तलाशनी होंगी; वहीं जल की कमी वाले क्षेत्रों में उपलब्ध जल के विवेकपूर्ण उपयोग की व्यवस्था विकसित करनी होगी। परंतु नदी जोड़ने जैसी किसी भी बड़ी योजना को केवल अभियंत्रण की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। नदी एक जीवंत पारिस्थितिक तंत्र है। उसकी धारा, बाढ़ मैदान, मछलियाँ, जलचर, वनस्पतियाँ, कृषि और नदी पर निर्भर समुदाय सभी उसके अस्तित्व का हिस्सा हैं। इसलिए किसी भी नदी-सम्बन्धी परियोजना से पहले पर्यावरणीय प्रभाव, स्थानीय जनजीवन, कृषि, जैव-विविधता, भूजल, संभावित विस्थापन और नदी के प्राकृतिक प्रवाह पर प्रभाव का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक है। बिहार की नदियों के संदर्भ में नेपाल से आने वाले जलप्रवाह और हिमालयी जलग्रहण क्षेत्रों की परिस्थितियों को भी व्यापक नदी-घाटी योजना में शामिल करना होगा। जलप्रवाह और बाढ़ की पूर्व सूचना के संबंध में सीमा-पार तथा अंतरराज्यीय समन्वय को भी मजबूत करना होगा। नदी प्रशासनिक सीमा नहीं जानती; इसलिए नदी प्रबंधन की दृष्टि भी केवल प्रशासनिक सीमाओं में सीमित नहीं रह सकती।

गाद प्रबंधन इस पूरी व्यवस्था का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग होना चाहिए। नदियों के साथ बहकर आने वाली मिट्टी और अन्य अवसाद प्राकृतिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं, लेकिन अत्यधिक मात्रा में गाद जमा होने से अनेक स्थानों पर नदी के तल, प्रवाह और जलनिकासी की स्थिति प्रभावित हो सकती है। इसलिए गाद प्रबंधन को किसी एक बार के अभियान के रूप में नहीं, बल्कि निरंतर वैज्ञानिक प्रक्रिया के रूप में विकसित करना होगा। प्रत्येक प्रमुख नदी और उसकी संवेदनशील सहायक धाराओं का नियमित सर्वेक्षण किया जाना चाहिए। नदी-तल की गहराई, चौड़ाई, प्रवाह, गाद की मात्रा और उसके संचय के स्थानों का समय-समय पर वैज्ञानिक आकलन हो। जहाँ विशेषज्ञ अध्ययन यह निर्धारित करे कि गाद हटाने से जलप्रवाह में सुधार और बाढ़ के जोखिम में कमी आ सकती है, वहाँ पर्यावरणीय सावधानियों के साथ वैज्ञानिक तरीके से गाद हटाने की व्यवस्था की जा सकती है। लेकिन केवल नदी से गाद निकालते रहना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी देखना होगा कि गाद नदी तक पहुँचती कहाँ से है। पहाड़ी और जलग्रहण क्षेत्रों में मिट्टी का कटाव, वनों की कमी, ढलानों पर अनियंत्रित गतिविधियाँ, वर्षाजल का तीव्र बहाव और भूमि के अनुचित उपयोग से बड़ी मात्रा में मिट्टी जलधाराओं में पहुँच सकती है। इसलिए गाद प्रबंधन का एक बड़ा हिस्सा नदी के बाहर, उसके जलग्रहण क्षेत्र में शुरू होना चाहिए। वृक्षारोपण, मृदा-संरक्षण, छोटे जल-संग्रहण ढाँचे, खेत-तालाब, मेड़बंदी, वर्षाजल संचयन और प्राकृतिक वनस्पति की रक्षा को बड़े स्तर पर बढ़ावा देना होगा। इससे वर्षाजल की गति नियंत्रित की जा सकती है, मिट्टी का कटाव कम हो सकता है और पानी के साथ बहकर आने वाली गाद की मात्रा घटाई जा सकती है। दूसरी ओर, नदी से वैज्ञानिक तरीके से निकाली गई गाद को बेकार पदार्थ मानकर छोड़ने के बजाय उसके गुणों की जाँच करके भूमि सुधार, निर्माण या अन्य उपयुक्त कार्यों में उपयोग की संभावनाएँ तलाशनी चाहिए। बिहार की पारंपरिक जल-संरचनाओं—आहर, पइन, तालाब, पोखर और स्थानीय जलाशयों—का पुनर्जीवन भी इसी योजना का महत्वपूर्ण भाग होना चाहिए। ये संरचनाएँ वर्षाजल के संचयन और स्थानीय जलनिकासी में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। अतिक्रमण के कारण बंद या संकुचित प्राकृतिक जलमार्गों की पहचान कर वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर उनका पुनर्जीवन किया जाना चाहिए। बाढ़ के पानी को केवल बाहर निकाल देना ही लक्ष्य न हो; जहाँ सुरक्षित और उपयुक्त हो, वहाँ उसका एक हिस्सा तालाबों, जलाशयों और भूजल पुनर्भरण क्षेत्रों में पहुँचाने की व्यवस्था भी की जाए। इससे बाढ़ के समय जल का दबाव कम हो सकता है और बाद में सिंचाई तथा पेयजल के लिए जल उपलब्धता बढ़ सकती है।

स्थायी समाधान के लिए तटबंधों की सुरक्षा, जलनिकासी, सुरक्षित आवास और पूर्व चेतावनी की व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। तटबंधों का निर्माण अपने आप में पर्याप्त सुरक्षा नहीं है; उनकी नियमित तकनीकी जाँच, संवेदनशील हिस्सों की पहचान, समय पर मरम्मत और आपातकालीन निगरानी आवश्यक है। तटबंधों के आसपास अतिक्रमण और अनियंत्रित निर्माण पर नियंत्रण होना चाहिए। जहाँ तटबंध प्राकृतिक जलप्रवाह को प्रभावित करते हों, वहाँ विशेषज्ञों द्वारा उनकी स्थिति और प्रभाव का अध्ययन कराया जाना चाहिए। गाँवों में जलनिकासी की व्यवस्था स्थानीय भूगोल के अनुरूप विकसित करनी होगी। सड़क, पुल, पुलिया और अन्य निर्माण कार्यों की योजना बनाते समय प्राकृतिक जलप्रवाह को अनिवार्य रूप से ध्यान में रखा जाना चाहिए। शहरों के लिए व्यापक वर्षाजल निकासी योजना आवश्यक है, क्योंकि शहरी विस्तार ने अनेक प्राकृतिक जलस्रोतों और जलनिकासी मार्गों पर दबाव बढ़ाया है। बाढ़-प्रवण क्षेत्रों का वैज्ञानिक मानचित्र तैयार करके यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि किन क्षेत्रों में निर्माण सीमित होना चाहिए, किन स्थानों पर सुरक्षित आवास विकसित किए जा सकते हैं और किन क्षेत्रों को प्राकृतिक बाढ़ मैदान के रूप में संरक्षित रखना आवश्यक है। पूर्व चेतावनी प्रणाली को गाँव के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाना होगा। नदी का जलस्तर, वर्षा और संभावित बाढ़ का पूर्वानुमान तभी उपयोगी है जब उसकी सूचना समय पर सरल भाषा में प्रभावित परिवारों तक पहुँचे। पंचायत, विद्यालय, स्थानीय स्वयंसेवी समूह और समुदाय इस व्यवस्था के महत्वपूर्ण सहयोगी बन सकते हैं। बाढ़ आने से पहले सुरक्षित स्थानों की जानकारी, आवश्यक दस्तावेजों की सुरक्षा, पशुधन को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाने की योजना और आवश्यक दवाओं तथा भोजन की व्यवस्था परिवारों को पहले से ज्ञात होनी चाहिए। महिलाओं, बच्चों, वृद्धों और दिव्यांगों की विशेष आवश्यकताओं को आपदा योजना में अलग स्थान मिलना चाहिए। पशुधन को भी राहत व्यवस्था का हिस्सा मानना होगा, क्योंकि ग्रामीण परिवारों की आर्थिक सुरक्षा अक्सर उनके पशुओं से जुड़ी होती है। राहत शिविरों में स्वच्छ पानी, भोजन, शौचालय, औषधि, महिलाओं के लिए आवश्यक सामग्री, बच्चों के लिए सुरक्षित स्थान और पशुओं के चारे की व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। राहत वितरण में पारदर्शिता और समयबद्धता आवश्यक है। संकटग्रस्त व्यक्ति को सहायता पाने के लिए बार-बार कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें, इसके लिए स्थानीय स्तर पर सरल व्यवस्था विकसित होनी चाहिए। यही प्रशासनिक संवेदनशीलता जनमानस के विश्वास को मजबूत करेगी।

बाढ़ के बाद पुनर्वास को केवल मकान बनाने तक सीमित करना भी बड़ी भूल होगी। किसी परिवार का घर टूटने के साथ उसकी रसोई, अनाज, कपड़े, बर्तन, पुस्तकें, प्रमाणपत्र, उपकरण, पशु और आय के साधन भी प्रभावित होते हैं। किसान की फसल नष्ट हो सकती है, मजदूर को काम नहीं मिल सकता, छोटे दुकानदार की दुकान बंद हो सकती है और विद्यार्थियों की पढ़ाई बाधित हो सकती है। इसलिए पुनर्वास का उद्देश्य परिवार को फिर से आत्मनिर्भर बनाना होना चाहिए। किसानों के लिए बीज, कृषि सामग्री और समय पर सहायता, पशुपालकों के लिए चारा और पशु चिकित्सा, छोटे व्यवसायियों के लिए काम फिर शुरू करने की सुविधा तथा विद्यार्थियों के लिए शिक्षण सामग्री और विद्यालयों की शीघ्र बहाली आवश्यक है। बाढ़ में खोए या नष्ट हुए आवश्यक दस्तावेजों को पुनः प्राप्त करने की प्रक्रिया सरल होनी चाहिए। पुनर्वास में स्थानीय समुदाय की भागीदारी महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि स्थानीय लोग सबसे अच्छी तरह जानते हैं कि किस परिवार की वास्तविक आवश्यकता क्या है। सरकार को दीर्घकालिक पुनर्वास और आजीविका सुरक्षा की स्पष्ट व्यवस्था करनी होगी। प्रत्येक बड़ी बाढ़ के बाद वैज्ञानिक समीक्षा होनी चाहिए कि कहाँ पानी अधिक फैला, कहाँ तटबंध कमजोर हुआ, कहाँ जलनिकासी बाधित हुई, कहाँ राहत देर से पहुँची और कहाँ लोगों को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाने में कठिनाई हुई। इन अनुभवों को अगले वर्ष की योजना में शामिल किया जाना चाहिए। इस प्रकार प्रत्येक बाढ़ अगली बाढ़ के लिए बेहतर तैयारी का आधार बने। पंचायत स्तर पर स्थानीय आपदा प्रबंधन दल विकसित किए जा सकते हैं। युवाओं, शिक्षकों, स्वास्थ्यकर्मियों, नाविकों और स्वयंसेवकों को प्राथमिक बचाव, प्राथमिक उपचार और सुरक्षित निकासी का प्रशिक्षण दिया जा सकता है। इससे आपदा की पहली घड़ी में सहायता पहुँचाने की स्थानीय क्षमता बढ़ेगी। जनमानस की शक्ति तभी स्थायी सामाजिक शक्ति बनेगी जब उसे ज्ञान, प्रशिक्षण और जिम्मेदारी से जोड़ा जाएगा। इस संदर्भ में पटना के शिक्षकों और शिक्षा-जगत से जुड़े लोगों की भूमिका फिर महत्वपूर्ण हो जाती है। विद्यार्थियों को केवल परीक्षा की तैयारी नहीं, बल्कि नागरिक जिम्मेदारी, पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण और आपदा के समय मानवीय सेवा का भी पाठ पढ़ाया जाना चाहिए। यदि शिक्षा मनुष्य को समाज के संकट में उसके साथ खड़े होने की प्रेरणा देती है, तो वह शिक्षा अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त करती है।

सरकार के प्रयास ऐसे होने चाहिए कि हर वर्ष बाढ़ के बाद केवल राहत बाँटने की आवश्यकता न पड़े, बल्कि धीरे-धीरे बाढ़ के प्रभाव को कम किया जा सके। इसके लिए एक दीर्घकालिक, समयबद्ध और उत्तरदायी महायोजना की आवश्यकता है, जिसमें जल संसाधन, सिंचाई, कृषि, ग्रामीण विकास, नगर विकास, पर्यावरण, वन, आपदा प्रबंधन, स्वास्थ्य, पशुपालन, परिवहन और स्थानीय प्रशासन के बीच स्थायी समन्वय हो। प्रत्येक प्रमुख नदी के लिए नदी-घाटी स्तर की योजना तैयार की जा सकती है, जिसमें जलप्रवाह, तटबंध, गाद, जलाशय, तालाब, आहर-पइन, नहर, भूजल और बाढ़ मैदान को एक साथ देखा जाए। जहाँ आवश्यकता हो, वहाँ छोटे जलसंग्रहण ढाँचे बनाए जाएँ; जहाँ आवश्यक हो, वहाँ जलनिकासी बेहतर की जाए; जहाँ वैज्ञानिक रूप से उचित हो, वहाँ नदियों के बीच जल के संतुलित हस्तांतरण की संभावनाओं का अध्ययन हो; और जहाँ नदी का प्राकृतिक विस्तार आवश्यक हो, वहाँ बाढ़ मैदानों को अनियंत्रित निर्माण से सुरक्षित रखा जाए। नदियों को जोड़ने की योजना को एकमात्र समाधान के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक जल प्रबंधन के एक संभावित घटक के रूप में देखा जाना चाहिए। किसी क्षेत्र में नदी जोड़ना उपयोगी हो सकता है, तो दूसरे क्षेत्र में तालाब, जलाशय, जलनिकासी सुधार, तटबंध सुरक्षा या जलग्रहण क्षेत्र संरक्षण अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। इसलिए समाधान क्षेत्र की वास्तविक परिस्थितियों पर आधारित होना चाहिए। इसी प्रकार गाद प्रबंधन में नदी की सफाई के साथ-साथ जलग्रहण क्षेत्र में मिट्टी के कटाव को रोकना भी आवश्यक है। योजना के लिए पाँच वर्ष, दस वर्ष और दीर्घकालिक लक्ष्य निर्धारित किए जा सकते हैं तथा प्रत्येक चरण की स्वतंत्र समीक्षा होनी चाहिए। बाढ़ जैसी समस्या किसी एक सरकार या एक पीढ़ी की समस्या नहीं है; यह आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न है। इसलिए समाधान की निरंतरता बनाए रखना आवश्यक है। योजना की सफलता का वास्तविक माप खर्च की गई राशि या निर्मित संरचनाओं की संख्या नहीं, बल्कि घटती जनहानि, कम होता विस्थापन, सुरक्षित होती फसल, संरक्षित होती संपत्ति, बचती आजीविका और बाढ़ के बाद शीघ्र सामान्य होता जनजीवन होना चाहिए। यदि पाँच या दस वर्षों के बाद भी वही गाँव उसी प्रकार डूबते रहें और वही परिवार हर वर्ष राहत की प्रतीक्षा करें, तो हमें अपनी नीति और योजना की पुनर्समीक्षा करनी होगी। विकास का वास्तविक अर्थ केवल नई संरचनाएँ बनाना नहीं, बल्कि ऐसी संरचनाएँ और व्यवस्थाएँ बनाना है जो मानव जीवन को सुरक्षित करें।

इस महाविभीषिका का सबसे बड़ा संदेश यही है कि मानवीय संवेदना और जनमानस की शक्ति को स्थायी व्यवस्था से जोड़ा जाए। बाढ़ के समय समाज का कोई व्यक्ति भोजन देता है, कोई पानी पहुँचाता है, कोई नाव उपलब्ध कराता है, कोई दवा देता है, कोई पशुओं के लिए चारा जुटाता है और कोई दूर बैठे लोगों को सहायता के लिए प्रेरित करता है। यही छोटी-छोटी संवेदनाएँ मिलकर मानवता की बड़ी शक्ति बन जाती हैं। पटना के खान सर, रोशन आनंद सर, एस.के. झा सर और अलख पांडेय सर जैसे शिक्षकों की भूमिका का उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण है कि शिक्षा से जुड़ी उनकी जनस्वीकृति और विद्यार्थियों तक पहुँच सामाजिक चेतना को व्यापक रूप दे सकती है। यदि उनकी आवाज के माध्यम से युवाओं में बाढ़ पीड़ितों के प्रति संवेदना, सत्यापित सूचना के प्रति जिम्मेदारी, राहत में सहयोग और दीर्घकालिक जल-संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ती है, तो शिक्षा का प्रभाव समाज के लिए अत्यंत उपयोगी रूप ले सकता है। किंतु इस जनशक्ति को केवल भावुक क्षणों में सक्रिय करना पर्याप्त नहीं है। इसे वर्ष भर जल संरक्षण, तालाबों के पुनर्जीवन, वृक्षारोपण, जलनिकासी मार्गों की रक्षा, पर्यावरण संरक्षण और आपदा तैयारी जैसे कार्यों से जोड़ना होगा। समाज को भी यह समझना होगा कि प्राकृतिक जलमार्ग में कचरा डालना, तालाबों को भरना, जलनिकासी मार्ग पर अतिक्रमण करना और बिना योजना के निर्माण करना भविष्य की बाढ़ को अधिक गंभीर बना सकता है। नागरिक जिम्मेदारी और सरकारी जिम्मेदारी दोनों साथ चलेंगी तभी स्थायी परिवर्तन संभव होगा। सरकार को भी ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें नागरिक की आवाज सुनी जाए, स्थानीय अनुभवों को योजना में शामिल किया जाए और बाढ़ के बाद मिली सीख को अगली योजना में स्थान मिले। शासन की सफलता केवल राहत शिविरों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से भी मापी जानी चाहिए कि अगले वर्ष कितने कम परिवार विस्थापित हुए और कितने कम जीवन प्रभावित हुए। यही वास्तविक परिवर्तन होगा।

बाढ़ की विभीषिका हमें प्रकृति से संघर्ष करने का नहीं, प्रकृति को समझकर उसके साथ संतुलित जीवन की व्यवस्था बनाने का संदेश देती है। नदियाँ बिहार की समस्या मात्र नहीं हैं; वे बिहार की जीवनधारा भी हैं। इन्हीं नदियों के जल से खेतों को जीवन मिलता है, भूजल का पुनर्भरण होता है, जैव-विविधता बनी रहती है और करोड़ों लोगों की आजीविका जुड़ी होती है। इसलिए लक्ष्य नदी को समाप्त करना या उसके प्राकृतिक अस्तित्व को बदलना नहीं, बल्कि उसके प्रवाह को वैज्ञानिक ढंग से समझना और जहाँ आवश्यक हो वहाँ मानव जीवन की सुरक्षा के लिए उचित व्यवस्था करना होना चाहिए। बाढ़ के पानी को केवल विनाश के रूप में देखने के बजाय उसके भीतर छिपे जल-संसाधन को भी पहचानना होगा। नदियों के वैज्ञानिक प्रबंधन, गाद की समस्या के दीर्घकालिक समाधान, जलग्रहण क्षेत्रों के संरक्षण, तालाबों और आहर-पइन के पुनर्जीवन, वर्षाजल संचयन, तटबंधों की नियमित निगरानी, प्राकृतिक जलनिकासी मार्गों की रक्षा, सुरक्षित आवास, पूर्व चेतावनी और समयबद्ध पुनर्वास को एक ही व्यापक योजना में जोड़ना होगा। तत्काल राहत में भोजन, स्वच्छ पानी, गैस और ईंधन, राशन, औषधि, आश्रय, वस्त्र और पशुओं के चारे की व्यवस्था हो; उसके बाद घर, खेत, रोजगार, शिक्षा और आजीविका की पुनर्स्थापना हो; और दीर्घकाल में ऐसी जल-व्यवस्था विकसित की जाए जिससे बार-बार उसी स्तर की त्रासदी की पुनरावृत्ति कम हो। यही सरकार की दीर्घकालिक जिम्मेदारी है और यही समाज की सामूहिक अपेक्षा। जनमानस की बढ़ती ताकत को किसी टकराव की शक्ति नहीं, बल्कि सहयोग, संवेदना, जागरूकता और रचनात्मक भागीदारी की शक्ति बनाना होगा। संकट के समय जो हाथ भोजन का पैकेट लेकर पीड़ित तक पहुँचता है, वही हाथ सामान्य दिनों में तालाब बचाने, वृक्ष लगाने, जलनिकासी मार्ग की रक्षा करने और नदी को स्वच्छ रखने में भी आगे आए—तभी मानवीय संवेदना स्थायी परिवर्तन में बदल सकेगी। यदि शासन की दूरदृष्टि, विज्ञान की शक्ति, शिक्षकों की सामाजिक चेतना, युवाओं की ऊर्जा और जनमानस की संवेदना एक साथ आगे बढ़ें, तो बिहार बाढ़ की त्रासदी से केवल हर वर्ष लड़ने वाला प्रदेश नहीं रहेगा, बल्कि अपनी नदियों और जल-संसाधनों के समुचित प्रबंधन का उदाहरण भी बन सकता है। यही इस महाविभीषिका का महासंदेश है—मनुष्य को केवल आपदा से बचाना पर्याप्त नहीं; ऐसी व्यवस्था बनाना आवश्यक है जिसमें आने वाली पीढ़ियों का जीवन बार-बार उसी आपदा के सामने असहाय न हो। राहत मानवता का कर्तव्य है, पुनर्वास सामाजिक न्याय का दायित्व है और स्थायी समाधान दूरदृष्टिपूर्ण शासन की आवश्यकता है। जब ये तीनों एक साथ आगे बढ़ेंगे, तभी बाढ़ की विभीषिका से स्थायी समाधान की राह खुलेगी और जनमानस की संवेदना वास्तव में बिहार के सुरक्षित, समृद्ध और मानवीय भविष्य की आधारशिला बन सकेगी।

— डॉ. अशोक

डॉ. अशोक कुमार शर्मा

पिता: स्व ० यू ०आर० शर्मा माता: स्व ० सहोदर देवी जन्म तिथि: ०७.०५.१९६० जन्मस्थान: जमशेदपुर शिक्षा: पीएचडी सम्प्रति: सेवानिवृत्त पदाधिकारी प्रकाशित कृतियां: क्षितिज - लघुकथा संग्रह, गुलदस्ता - लघुकथा संग्रह, गुलमोहर - लघुकथा संग्रह, शेफालिका - लघुकथा संग्रह, रजनीगंधा - लघुकथा संग्रह कालमेघ - लघुकथा संग्रह कुमुदिनी - लघुकथा संग्रह [ अन्तिम चरण में ] पक्षियों की एकता की शक्ति - बाल कहानी, चिंटू लोमड़ी की चालाकी - बाल कहानी, रियान कौआ की झूठी चाल - बाल कहानी, खरगोश की बुद्धिमत्ता ने शेर को सीख दी , बाल लघुकथाएं, सम्मान और पुरस्कार: काव्य गौरव सम्मान, साहित्य सेवा सम्मान, कविवर गोपाल सिंह नेपाली काव्य शिरोमणि अवार्ड, पत्राचार सम्पूर्ण: ४०१, ओम् निलय एपार्टमेंट, खेतान लेन, वेस्ट बोरिंग केनाल रोड, पटना -८००००१, बिहार। दूरभाष: ०६१२-२५५७३४७ ९००६२३८७७७ ईमेल - ashokelection2015@gmail.com

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