भाषा-साहित्य

देवेन्द्र माँझी के सृजन संसार में सामाजिक चेतना

समकालीन हिंदी और उर्दू साहित्य के परिदृश्य में देवेन्द्र माँझी एक अत्यंत संवेदनशील, यथार्थवादी और लोक-चेतना से संपृक्त रचनाकार हैं। उनके व्यापक सृजन-संसार का फलक अत्यंत विस्तृत है, जिसमें ग़ज़लों के साथ-साथ गीतों, दोहों, उपन्यासों और गंभीर शोधपरक शब्दकोशों का समावेश है। साहित्य के प्रति माँझी जी का दृष्टिकोण कलावादी या विलासितापूर्ण न होकर मूलतः लोक-कल्याणकारी और सामाजिक दायित्वों से ओत-प्रोत है। उनके साहित्य की मूल धड़कन समाज के उस अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति की पीड़ा है, जिसे व्यवस्था और संवेदनहीन समाज ने हाशिए पर धकेल दिया है। प्रस्तुत लेख में देवेन्द्र माँझी के संपूर्ण सृजन-संसार में व्याप्त सामाजिक चेतना के विभिन्न आयामों का साक्ष्य-सहित विस्तृत विवेचन किया गया है।

1.आम आदमी का जीवन-संघर्ष, ग़रीबी और भूख का कारुणिक यथार्थ

देवेन्द्र माँझी के काव्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे आम आदमी की दैनिक समस्याओं और उनकी बेबसी को बहुत ही मार्मिक ढंग से चित्रित करते हैं। उनके सृजन में ग़रीबी और भूख का चित्रण केवल एक बौद्धिक विमर्श नहीं है, बल्कि एक खुरदरा और नग्न यथार्थ है, जो पाठक की अंतरात्मा को झकझोर देता है। समाज में व्याप्त गंभीर आर्थिक विषमता और ग़रीबों के जीवन की अनिश्चितता को दर्शाते हुए वे लिखते हैं:
“कोई छप्पर है न कोई छान है, वैसे अपना सारा हिन्दुस्तान है।”

यह शेर आज के स्वतंत्र भारत के उस कड़वे सच को उद्घाटित करता है, जहाँ बुनियादी सुविधाओं का अभाव करोड़ों लोगों की नियति बन चुका है। माँझी जी का हृदय उस अनाथ, अशिक्षित और असहाय बचपन के लिए तड़प उठता है जो सड़कों पर भीख माँगने या मजदूरी करने को विवश है। फुटपाथ पर रहने वाले इंसानों की कारुणिक गाथा को वे अपने शब्दों में इस प्रकार पिरोते हैं:
“ग़ुम हुआ क़हक़हा-सा फुटपाथ पर, पढ़ रहा मर्सिया फुटपाथ पर।
पूछते हैं सब ये किसका पाप है, देखकर बच्चा पड़ा फुटपाथ पर।
दिन में सारा जहाँ अपना समझ, रात में बिस्तर लगा फुटपाथ पर।”

यह मर्सिया (शोकगीत) आज के प्रगतिशील समाज के माथे पर एक गहरा कलंक है, जहाँ दिनभर भटकने के बाद मासूम बच्चे फुटपाथ को ही अपना बिस्तर बनाने को अभिशप्त हैं। इसी प्रकार, ग़रीबों की विवशता और बच्चों की भूख को वे अत्यंत तीव्रता से रेखांकित करते हैं:
“नहीं था एक भी पैसा, खिलाता क्या, पिलाता क्या,
मैं घर में आज भी बच्चों को भूखा छोड़ आया हूँ।”

एक मज़दूर पिता की इस छटपटाहट से बढ़कर सामाजिक पीड़ा और क्या हो सकती है, जो बच्चों के लिए एक वक्त की रोटी का प्रबंध भी नहीं कर पाता? माँझी जी की दृष्टि डिजिटल इंडिया और आधुनिक तकनीकी विकास के उस खोखलेपन को भी उजागर करती है जो ज़मीनी यथार्थ से बिल्कुल कटे हुए हैं। वे आज की इंटरनेट-उन्मुख पीढ़ी को सचेत करते हुए कहते हैं:
“गूगल पर तुम ‘सर्च’ करो मत देखो इंटरनेटों पर,
भूख आदमी की कितनी है पूछो उनके पेटों से।”

इस प्रकार, वे दर्शाते हैं कि मानवीय भूख और ग़रीबी का समाधान किसी सर्च इंजन पर नहीं, बल्कि समाज की मुख्यधारा में उन भूखे पेटों के यथार्थ को स्वीकार करने से ही हो सकता है।

2.व्यवस्थागत विसंगतियाँ, राजनीतिक पाखंड और नैतिक पतन पर तीखा प्रहार

देवेन्द्र माँझी के सृजन संसार का एक बड़ा हिस्सा राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था की विद्रूपताओं पर करारे प्रहार के लिए जाना जाता है। वे देखते हैं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के सर्वोच्च मंदिरों में भी नैतिकता की सरेआम धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। संसद के भीतर होने वाले खोखले विमर्शों और नैतिक पतन पर वे गहरा कटाक्ष करते हैं:
“संसद के भीतर और बाहर एक बहस है छिढ़ी हुई,
किसने लूटा नैतिकता को, कौन लुटेरा आया था?”

यह प्रश्न आज की लोकतांत्रिक प्रणाली की साख और जनप्रतिनिधियों की निष्ठा पर गहरा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। वे उन नेताओं और शासकों की शुचिता का पर्दाफ़ाश करते हैं जो संविधान की शपथ तो लेते हैं, परंतु सत्ता मिलते ही उसे ताक पर रख देते हैं:
“मुल्क की सेवा करूँगा खाई थी जिसने क़सम,
संविधान इस मुल्क का उसने उठाकर रख दिया।”

इस प्रकार, संविधान की अवहेलना और राजनीतिक स्वार्थपरता उनकी सामाजिक चेतना का मुख्य निशाना बनती है। वे आज की ‘ले-दे’ (घूसखोरी और भ्रष्टाचार) की संस्कृति पर व्यंग्य करते हुए लिखते हैं:
“हो तो जाते हैं काम-ले-देके, ठीक है ये निज़ाम-ले-देके,
है सियासत या पाट चक्की के, इसमें पिसता अवाम ले-देके।”

यह शेर स्पष्ट करता है कि राजनीतिक व्यवस्था और प्रशासनिक तंत्र वास्तव में चक्की के दो पाटों की तरह हैं, जिसके बीच में सदैव असहाय और निरीह जनता (‘अवाम’) ही पिसती आ रही है। माँझी जी ने उस छद्म और बनावटी ‘शरीफ़’ वर्ग को भी आड़े हाथों लिया है, जो सामाजिक विद्रूपताओं के पीछे अपना चेहरा छिपाए रहता है:
“शराफ़त के हमें मतलब न समझाओ यहाँ साहिब,
हमारी उम्र सारी इन शरीफ़ों में-ही बीती है।”

उनकी यह बेबाकी अभिजात्य वर्ग के दोहरे चरित्र और उनके छद्म शिष्टाचार की पोल खोल देती है। वे जानते हैं कि भ्रष्ट और अनैतिक ताक़तों के इस दौर में सच बोलना कितना कठिन और जोखिम भरा कार्य है:
“सच्चाई कह गये जब होंठ मेरे,
ज़माना हो गया मुझसे ख़फ़ा सा।”

जब-जब कोई कवि समाज को उसका असली चेहरा दिखाने के लिए आईना उठाता है, तो स्थापित संभ्रांत व्यवस्था उस आईने को ही नष्ट करने के लिए दौड़ पड़ती है:
“चीख़ उठे शहर के सब लोग ‘इसको तोड़ दो’,
जब कभी ‘माँझी’ के हाथों आईना देखा गया।”

यह आईना सच का प्रतीक है, जिसे देखकर पाखंडी और शोषक वर्ग अपनी कुरूपता प्रकट होने के भय से भयभीत हो जाता है।

3.न्याय व्यवस्था की शिथिलता और सत्य का संकट

माँझी जी का सृजन-संसार केवल सामाजिक विसंगतियों को ही नहीं दिखाता, बल्कि वह न्याय की चौखट पर होने वाले अन्याय और सत्य के संकट को भी स्वर देता है। आज की न्यायिक प्रक्रिया में सत्य के दम तोड़ने और पैसे तथा ताक़त के बल पर झूठ के विजयी होने की विडंबना पर वे गहरा प्रहार करते हैं:
“अदालत में सच्चाई को रगड़ते एड़ियाँ देखा,
गवाहों के सहारे झूठ ही नाचे सदा मटके।”

न्यायालयों में गवाहों की ख़रीद-फ़रोख़्त और झूठ के इस नग्न नृत्य का ऐसा यथार्थपरक चित्रण हिंदी ग़ज़ल साहित्य में विरला ही मिलता है। सत्य की इस लाचारी और झूठ के वर्चस्व को रेखांकित करते हुए वे आगे लिखते हैं:
“झूठ का सिक्का उछलता हर तरफ़,
सच सरे-बाज़ार अब लाचार है।”

आज की इस नैतिक शून्यता के दौर में सच को हाशिए पर धकेल दिया गया है और समाज में केवल मुखौटों की सत्ता रह गई है:
“तुम हो चेहरे और मुखौटे वक़्त के,
टूटकर बिखरा हुआ शीशा हूँ मैं।”

यह ‘शीशा’ टूटकर भी सत्य को प्रतिबिंबित करने की अपनी हठ नहीं छोड़ता, जो कवि के जुझारू तेवर को प्रकट करता है।

4.टूटते मानवीय मूल्य, पारिवारिक बिखराव और महानगरीय संवेदनहीनता

माँझी जी ने अपनी छह दशकों से अधिक की जीवन-यात्रा में गाँव की आत्मीयता से लेकर महानगर की संवेदनहीनता और अमानवीयता के अनेक रूपों को बहुत नज़दीक से देखा है। वे अपनी ग़ज़लों और दोहों में उस समय को याद करते हैं जब ग्रामीण समाज में लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में हाथ बँटाते थे और सामूहिक भाईचारा जीवित था। परंतु आज उपभोक्तावादी संस्कृति के प्रभाव में आकर वे मानवीय मूल्य और पारिवारिक रिश्ते तार-तारे हो चुके हैं:
“एक समय था, जब सम्मिलित और संगठित परिवार होते थे… घर के बुज़ुर्गों को यथोचित सम्मान दिया जाता था लेकिन आज उसका ठीक उल्टा हो रहा है। आज परिवार बिखर गए हैं।”

वृद्धों की उपेक्षा और संयुक्त परिवारों के बिखराव की इसी कड़वी सच्चाई को वे अपने एक अत्यंत मार्मिक शेर में ढालते हैं:
“अच्छा पढ़कर नौकरी पा, जा बसे बच्चे विदेश,
ये मलाल अब कैसा है जैसा भी सोचा वो हुआ।”

यह आधुनिक समाज का वह त्रासद यथार्थ है, जहाँ माता-पिता बच्चों को सुनहरे भविष्य के लिए विदेश भेजते हैं, लेकिन अंततः बुढ़ापे में स्वयं नितांत अकेले और असहाय रह जाते हैं। आधुनिक महानगरीय जीवन की संवेदनहीनता को वे इस प्रकार स्पष्ट करते हैं:
“शहर घाट का पत्थर दिखाई देता है।”

जिस प्रकार नदी के घाट का पत्थर पानी के निरंतर थपेड़ों को सहकर भी कठोर और निष्ठुर बना रहता है, उसी प्रकार शहर के लोग भी दूसरों की पीड़ा के प्रति पूरी तरह से उदासीन और संवेदनहीन हो चुके हैं। वे अमानवीयकरण की इस सीमा पर चिंता व्यक्त करते हुए लिखते हैं:
“डर रहा इंसान अब इंसान से,
ये ही मेरे देश की तस्वीर है।”

जब मनुष्य का मनुष्य पर से विश्वास उठ जाए और वह अपने ही सहधर्मी से भयभीत होने लगे, तो यह किसी भी सभ्य समाज के पतन की पराकाष्ठा है।

5.शोषित नारी, मज़बूरी और अस्मत का बाज़ार

देवेन्द्र माँझी का साहित्य केवल पुरुषों के संघर्षों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह स्त्री के प्रति हो रहे अनवरत सामाजिक शोषण और उसकी विवशता को भी पूर्ण सहानुभूति के साथ वाणी देता है। घोर दरिद्रता और भूख के कारण जब समाज की कोई निर्धन स्त्री अपनी मर्यादा और अस्मत बेचने को विवश होती है, तो माँझी जी का कवि हृदय चित्कार कर उठता है:
“भूख बढ़ी कुछ ज़्यादा ही या सूखे अंकुर ग़ैरत के,
रोटी में अस्मत बिक जाये बात तो कोई होगी ही।”

यह दो पंक्तियाँ उस भूख की भयावहता को दर्शाती हैं, जो मनुष्य से उसकी ग़ैरत और आत्मसम्मान तक छीन लेती है। इसी प्रकार, वे समाज के उन ठेकेदारों पर भी गहरा तंज कसते हैं जो दिन में तो शुचिता का ढोंग करते हैं, परंतु रात के अंधकार में वेश्यावृत्ति के बाज़ार (‘बाज़ारे-हुस्न’) को आबाद करते हैं:
“बाज़ारे-हुस्न छुपने लगा भीड़भाड़ में,
मानूस हर दुकान से रहने लगे हैं लोग।”

वे उस विवश मज़दूर स्त्री की पीड़ा को भी सबके सामने लाते हैं जो कई संपन्न घरों में भोजन पकाकर दूसरों की भूख तो शांत करती है, परंतु उसके अपने बच्चे रात को भूखे सोने पर विवश हैं:
“ख़ाना कई घरों में बनाती है जिनकी माँ,
बच्चों के मुँह में उसके निवाला नहीं गया।”

यह शेर सामाजिक और आर्थिक असमानता के उस क्रूर चेहरे को बेनकाब करता है जो हमारे श्रम-विभाजन की बुनियादी विसंगति से उपजा है।

6.सांप्रदायिकता, धार्मिक पाखंड और वैचारिक स्वतंत्रता पर प्रतिबंध

एक सामाजिक चिंतक के रूप में देवेन्द्र माँझी सांप्रदायिकता और धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा के प्रबल विरोधी हैं। वे देखते हैं कि धर्म, जो वास्तव में मनुष्य को जोड़ने का साधन होना चाहिए था, आज विभाजनकारी ताक़तों का औज़ार बन गया है। वे प्रश्न करते हैं:
“आपस में क्यों लड़ती हैं गीता, बाइबल और क़ुरआन,
इंसानों में देखे हैं पीर, पैग़म्बर और शैतान।”

उनका स्पष्ट मानना है कि मानवता सबसे बड़ा धर्म है और जब तक मनुष्य स्वयं के भीतर इंसानियत को जीवित नहीं रखता, तब तक बाहरी पूजा-पाठ केवल एक पाखंड मात्र है। वे शासक वर्ग द्वारा जनता के विचारों और उनकी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर लगाए जा रहे पहरों और प्रतिबंधों के ख़िलाफ़ भी मुखर हैं:
“होंठ तो पहले ही तुमने सी दिये हैं,
सोच पर बंदिश लगाना ठीक है क्या।”

साहित्यकार और लेखक की लेखनी पर लगाए जा रहे वैचारिक नियंत्रणों के विरुद्ध वे अत्यंत निर्भीकता से चेतावनी देते हुए कहते हैं:
“ये सिर भी हमारा कटेगा यक़ीनन,
रक्खा जो नहीं है क़लम पर नियंत्रण।”

यह घोषणा कबीर की उस फक्कड़ और बागी परंपरा की याद दिलाती है, जहाँ सत्य कहने के लिए अपने प्राणों की बाज़ी लगाने से भी पीछे नहीं हटा जाता था।

7.’माँझी’ उपनाम (तख़ल्लुस) के माध्यम से सामाजिक चेतना का संदेश

देवेन्द्र माँझी के सृजन संसार की एक अन्य विशिष्टता यह है कि उन्होंने उर्दू ग़ज़ल की मक़्ता परंपरा का निर्वहन करते हुए अपने उपनाम ‘माँझी’ को महज़ एक पहचान नहीं, बल्कि सामाजिक संघर्ष के एक जीवंत प्रतीक के रूप में ढाला है। वरिष्ठ आलोचक डॉ. शेरजंग गर्ग के अनुसार, उन्होंने ‘माँझी’ शब्द को नदी, तूफ़ान, नाव, भँवर, दरिया, लहर, तट और पतवार जैसे रूपकों में इस प्रकार पिरोया है कि वह जीवन-संघर्ष और सामाजिक चेतना का एक महा-रूपक बन जाता है।

जब वे कहते हैं:
“पतवार की ख़ूब मशक्क़त रही नाव ने ही हार ‘माँझी’ मान ली”
या—
“नाव को तेज़ कर चलो ‘माँझी’ अब तो लहरों के नाग डसते हैं।”

तो यहाँ ‘नाग’ और ‘लहरें’ सामाजिक विसंगतियों, शोषक वर्गों और उन तमाम बाधाओं का प्रतीक हैं जो आम आदमी के जीवन की नैया को आगे बढ़ने से रोकती हैं। परंतु ‘माँझी’ हार मानने वाला नहीं है। वह विषम परिस्थितियों, तूफ़ानों और प्रतिकूलताओं से निरंतर लोहा लेता है:
“सर्द लहरों से तेरा नाव में बैठा ‘माँझी’,
आग दरिया में लगाता रहा हौले-हौले।”

यह ‘आग दरिया में लगाना’ वास्तव में स्थापित शोषक व्यवस्था के विरुद्ध वैचारिक और सामाजिक क्रांति का बिगुल फूंकना है।

निष्कर्ष

निष्कर्षतः, देवेन्द्र माँझी का सृजन-संसार अपनी कुल 30 पुस्तकों के विशाल कैनवास पर सामाजिक चेतना का एक अत्यंत प्रामाणिक, सशक्त और विस्तृत दस्तावेज़ प्रस्तुत करता है। उनकी लेखनी महज़ कलावादी सुख या कोरी रोमानियत के लिए नहीं चलती, बल्कि वह सामाजिक न्याय, मानवीय गरिमा और नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना के प्रति गहरे रूप से प्रतिबद्ध है। ग़रीबों, मज़दूरों, उपेक्षित वृद्धों, पीड़ित स्त्रियों और शोषित वर्गों की आवाज़ बनकर देवेन्द्र माँझी ने समकालीन हिंदी-उर्दू साहित्य को एक नई सामाजिक धार और दिशा दी है। समाज की विसंगतियों पर करारा प्रहार करते हुए भी वे कभी हताश नहीं होते; अपितु वे एक नए सूर्य के उदय और मानवीय भाईचारे की पुनर्स्थापना के लिए निरंतर आशावान बने रहते हैं। उनका यह अवदान समकालीन साहित्य की एक अमूल्य और अक्षुण्ण धरोहर है।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563

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