गज़ल
प्यार का फिर शुरू सिलसिला कीजिए।
आप हँसकर कभी तो मिला कीजिए।।
दर्द हद से ज़ियादा न सह पाए दिल।
रूठने की वजह अब बयाँ कीजिए।।
दिल में शिकवे-गिले जो दबे रह गए।
आज खुलकर उन्हें फिर कहा कीजिए।।
दूरियाँ अब बहुत हो गईं दरमियाँ।
दो कदम आप भी तो बढ़ा कीजिए।।
मैं भी बाँहें पसारे खड़ी हूँ यहाँ।
प्रीत से आ गले फिर मिला कीजिए।।
बात छोटी-सी है, दिल समझता नहीं।
लफ़्ज़ आँखों के मेरे पढ़ा कीजिए।।
जो कहा भी नहीं, जो सुना भी नहीं।
दर्द ख़ामोशियों का सुना कीजिए।।
आपकी बेरुख़ी दिल को चुभती बहुत।
दूर रहकर न अब यूँ ख़ता कीजिए।।
कुछ कहा कीजिए, कुछ सुना कीजिए।
रंग उल्फ़त से दिल को रँगा कीजिए।
ऐ “मृदुल” ठोकरों से भी उल्फ़त मुझे।
हो सके हर कदम पर दुआ कीजिए।
— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”
