बेटियों का डर
विधा- कविता
शीर्षक- बेटियों का डर
सर्व समर्थ हो बेटियों, डर-डर कर क्यों रहती हो,
पुरुषों के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर चलती हो,
परीक्षाओं में पुरुषों से अधिक अच्छा परिणाम देती हो,
घर-बाहर कुशलता से काम कर लेती हो,
हर क्षेत्र में सफलता का झंडा गाड़ देती हो,
पुरुषों और महिलाओं के वेतन-सम्मान में भेदभाव के प्रति,
अपनी आवाज उठाओ,
चिंतन की ललकार सुनो,
निपुणता से अपने सपनों को बुनो,
चिंतन करो, दो जवाब सुनकर चिंतन की ललकार,
छीन लो अपने जायज अधिकार!
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया
