कहानी

वो एक सवारी क्या उतरी

​ट्रेन के डिब्बे में लोगों की चहल-पहल थी, पटरियों पर लोहे के टकराने की गड़गड़ाहट और बाहर गुज़रते हुए मंज़र… सब कुछ हमेशा जैसा ही था। लेकिन उस दिन, उस एक सफ़र में कुछ अलग था।

​सामने वाली सीट पर आकर बैठी । उसने बस एक बार सर उठाकर देखा और अपनी डायरी खोलने लगी। उसकी आँखों में एक अजीब सी ख़ामोशी थी, ऐसी ख़ामोशी जो चीख-चीखकर अपनी कहानी बयान करती है। साहिल, जो हमेशा अपनी ही दुनिया में खोया रहता था, पहली बार किसी के वजूद को इतनी शिद्दत से महसूस कर रहा था।

​शुरुआत हुई एक मामूली से सवाल से “क्या अगला स्टेशन जयपुर है?” ​और फ़िर, बातों का सिलसिला जो शुरू हुआ तो थमा ही नहीं। ऐसा लगा जैसे दो अजनबी सालों से एक-दूसरे का इंतज़ार कर रहे थे। उन्होंने ज़िंदगी, अधूरी ख़्वाहिशों, और उन चीज़ों के बारे में बातें कीं जो वे कभी अपने क़रीबी लोगों से भी न कह सके थे। ट्रेन की गड़गड़ाहट के बीच दोनों की आवाज़ें एक सुकून भरा नग़मा बन चुकी थीं। साहिल को लगा कि सफ़र कभी ख़त्म न हो, यह ट्रेन बस चलती रहे।

​लेकिन वक़्त बहुत बेरहम होता है। ​ट्रेन की रफ़्तार धीमी हुई। उसने अपना बैग उठाया। साहिल का दिल जैसे अचानक थम सा गया। उसने मेहर की तरफ़ देखा, उसकी आँखों में एक ख़ामोश इल्तजा थी ‘रुक जाओ ना…’ या कम से कम ‘अपना नाम और नंबर तो देती जाओ’ ​लेकिन वो सिर्फ़ मुस्कुराई। उस मुस्कुराहट में एक अजब सा दर्द था। उसने कहा, “कुछ सफ़र सिर्फ़ महसूस करने के लिए होते हैं, मंज़िल तक पहुँचने के लिए नहीं।”

​वह उतरी और स्टेशन की भीड़ में ओझल हो गई। उसके जाते ही डिब्बा जैसे पूरी तरह ख़ाली हो गया। आसपास लोग अब भी बैठे थे, शोर अब भी था, लेकिन साहिल के लिए सब कुछ सुनसान हो चुका था। ​साहिल समझ चुका था कि अहसासों से लड़ा नहीं जाता, उन्हें स्वीकार करना पड़ता है। लेकिन सफ़र का सिलसिला कहाँ रुकता है। कुछ महीनों बाद, एक दिन फ़िर उसी ट्रेन के सफ़र के दौरान साहिल के क़दम अचानक थम गए।

​सामने वही चेहरा था, वही सादगी, और आँखों में वही गहरा ठहराव। साहिल ने एक लंबी साँस ली, अपने दिल की धड़कनों को सँभाला और धीरे-धीरे चलकर उसके पास पहुँचा। ​उसने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा, “वो एक सवारी क्या उतरी थी… मैं तो भरी ट्रेन में भी अकेला हो गया था। पर आज यक़ीन हुआ कि कुछ सफ़र सिर्फ़ यादों में ख़त्म होने के लिए नहीं, बल्कि दोबारा मिलने के लिए शुरू होते हैं।”

​मेहर ने अचानक मुड़कर देखा। उसके हाथ में वही डायरी थी। पल भर के लिए उसकी आँखों में हैरत तैर गई, और फ़िर होंठों पर वही जानी-पहचानी मुस्कुराहट बिखर गई। ​उसने अपनी डायरी बंद की और बेहद नरमी से बोली, “और मैं सोच रही थी कि क्या वो मुसाफ़िर आज भी उसी खिड़की के पास बैठा होगा…” ​दोनों के बीच की दूरी अब ख़त्म हो चुकी थी। इस बार न कोई जल्दी थी, न छूटने का डर।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़ 

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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