कहानी – मुर्दे की मुस्कान
रात भर आसमान चीखते- चीखते सो चुका था। धरती पर फैले रूधिर रक्त ने उसका रंग बदल दिया था। सूरज का गोला लगातार ऊपर उठता जा रहा था। इंकलाबी नारों से वातावरण हांफने लगा था। उसकी क्षत- विक्षत लाश को सहेज कर सफेद चादर से ढ़क दी गई थी , जिससे इसके बाद का खेल जारी रह सके। यूनियन नेता ऐसे खेलों के विशेषज्ञ होते हैं। यहां भी दिन होते ही वे खदान की ओर दौड़ने लगे थे।
दौड़ वह परिवार भी रहा था, एक ऐसी दौड़ जिस पगडंडी पर हर कोई नहीं दौड़ पाता। दौड़ने की उन्हें कीमत चुकानी पड़ती हैं, हर दौड़ की एक वजह होती है । उस वक्त खदान में बड़ी अफरा- तफरी मची हुई थी और सबकी मुंह पचर- पचर कर रहा था। सबके बीच उस घटना, उसकी नियत और नियति पर जैसे बहस छिड़ी हुई थी। ऐसे में कोलियरी क्षेत्र में तेजी से अपना पांव जमाने में लगा, उभरते युवा मजदूर नेता जगत महतो का यह ऐलान, ” लाश उठने के पहले उनके आश्रित को प्रबंधन नौकरी दे..! ” कह जगत महतो भीड़ के केन्द्र में आ गया था। उधर तथाकथित मजदूर मसीहा कहलाने वाले और क्षेत्र का विधायक राजदेव सिंह ने भी ऐसा ही ऐलान कर अपनी साख बचाने की कोशिश की थी। प्रबंधन दोहरे दबाव में आ गया था। कोलियरीयों में पहले विधायक राजदेव का ही एक मात्र सिक्का चलता था। वक्त के साथ क्षेत्र में बदलाव समय की मांग बन चुकी थी। अब जगत महतो का जलवा का दौर था, ” अब जो होगा,जगत महतो की जानकारी में होगा..!” लोग भी तरह तरह के कयास लगाने लगे थे।
जगत महतो के साथ ही मैने भी शमशुल की क्षत- विक्षत लाश देखी थी। मेरे शरीर के तो रोंगटे खड़े हो गये थे। मन में सवाल उठा, ” क्या यह सचमुच का एक हादसा है या फिर आत्महत्या..? ” तभी मेरे कानों में शमशुल की कही बातें टकराने लगी थीं, जो उसने मुझे एक गमगीन दोपहरी को आफिस में आकर कही थी, छुट्टी की जानकारी लेने आया था -” आज जीवन बड़ा जटिल हो गया है बड़ा बाबू, जीने के नाम से ही डरने लगा है मन ! “
जहां तक मुझे पता था शमशुल एक साथ दो पदो पर जी रहा था। दो नाव पर जैसे सवार था। कोलियरी में बेस्ट शॉबल आपरेटर का दर्जा प्राप्त था, वहीं अपने गांव सहरिया का सदर भी वही था। इसके बावजूद वह अपने जीवन से तनिक भी खुश नहीं था, ऐसा उसका मन कहता था। वह अक्सर कहा भी करता था-” अपना जीवन अपना जैसा नहीं लगता, आंतरिक खुशियों का मोहताज हो गया हूँ। घर में सभी की अपनी- अपनी पसंद है लेकिन मैं किसी की पसंद का नहीं हूँ..! ” एक साथ वह बहुत सारे उलझनों में उलझा नज़र आता। हमेशा अपने में एक दबाव महसूस करता- एक अनचाहे भार का ।
इधर डेढ़- दो साल से वह खासा परेशान था। लोग इसका कारण उसकी घरेलू उलझन और पारिवारिक दबाओं के साथ जोड़ कर देखते थे। इसके पीछे ठोस कारण भी था- अपनी आठ बेटियों में से छ: की शादी कर चुका था वह। और सातवीं की भी एक जगह रिश्ता पक्की हो चुकी थी। लेन- देन का मामला भी सुलटा लिया गया था। अगले साल निकाह का होना तय था। लेकिन चिंता का कारण बनी थी आठवीं बेटी जो बचपन से एक पांव से अपाहिज़ थी। लकवे का शिकार हो गई थी वह। बैसाखी के सहारे चलती- फिरती। एक मौलवी का बेटा तीन लाख में उस लड़की की बैसाखी बनने को तैयार था। पर यह शमशुल के बूते से बाहर की बात थी। सात बेटियों की शादी करते – कराते वह खोखला हो चुका था। उधर कोख पोंछवा के रूप में जन्में एक मात्र पुत्र शमशुद्दीन के जीवन को संवारना भी उसी का काम था। ताकि बड़ा होकर खुद उसके बूढ़ापे की लाठी बन सके।
ऊपर से घटती विकास दर की तरह शमशुल की सेहत भी दिन- प्रतिदिन गिरती जा रही थी। और इसके लिए लोग उसके घटते- बढ़ते रक्तचाप को दोषी मान रहे थे, परन्तु उसकी चिनिया बीमारी और रक्तचाप का घटना- बढ़ना कुछ- कुछ उसी दिन से शुरू हो गया था, जिस दिन से छठे वेतनमान समझौते की खबर अखबारों में ” छाई ” की तरह छा गयी थी। ट्रेंड यूनियन में गहरी आस्था रखने वाले शमशुल उसके बाद से ही काफ़ी संजीदा हो गया था। घरेलू उलझनों के दबाव से तो वह पहले ही दबा हुआ था। श्रमिक संगठनों को मजदूर हितों का एक सुरक्षित मंच समझने वाले शमशुल को जब यह पता चला कि बदली- बहाली का प्रावधान अब नहीं रहेगा, मृत आश्रितों को उसी सूरत पर नौकरी दी जायेगी जब खान घटना -दुर्घटना में मजदूर की जान चली जायेगी..!
इस खबर से वह और बैचेन हो उठा था, और कई रात वह ठीक सो नहीं सका था। इसके बाद से ही शमशुल काफी उदास- उदास रहने लगा था। किसी काम में उसका मन नहीं लगता। संगठन और संगठन के नेताओं से भी दूर- दूर देखा जाने लगा था । इसी के साथ उसके अंदर एक नकारात्मक सोच ने जगह बनानी शुरू कर दी थी। जो शमशुल कभी अपने यूनियन नेता की आलोचना को बरदास्त नहीं कर पाता था, उल्टे आलोचना करने वाले से भिड़ जाता था, अब वही शमशुल अपने नेता की अर्थी निकालने की बातें करने लगा था । इसकी एक झलक उस वक्त देखने को मिला था, जब छठे वेतनमान समझौते में हुई घोर विसंगतियों के विरोध में पूरा कोयला जगत में घोर विरोध शुरू हो गया था। मजदूर तीन दिवसीय हड़ताल पर चले गए और जगह- जगह, धरना- परदर्शन करने लगे, दोषी नेताओं के पुतले फूंके जाने लगे थे । उस घड़ी शमशुल का गुस्सा सातवें आसमान पर थी। एक पिट मीटिंग में अपनी भड़ास निकालते हुए कहा ” अगर हम मजदूर भाई सावधान और सतर्क न रहें, तो ऐ दोगले नेता हमारी सुविधाओं को प्रबंधन का बिस्तर बना देंगे, और हम हर जगह रौंदे जाएंगे..! “
उसी सजग प्रहरी शमशुल की मौत ने हमें सकते में डाल दिया था। जिसे मैं जानता भी था और पहचानता भी था।
शमशुल का जन्म एक ऐसे मुस्लिम परिवार में हुआ था, जहां रूढ़िवादी परम्परा का बड़ा जोर था। बाप उसका गांव के मदरसे का मौलबी था। और अपने बाद अपने बेटे अर्थात शमशुल को उस मदरसे का मौलवी के रूप में देखने की इच्छा पाल रखी थी उसने। शुरू- शुरू में शमशुल ने मदरसे में तालीम पायी जरूर लेकिन मदरसे में पढ़ने में मन उसका कभी नहीं लगा। एक दिन बाप की इच्छा से बगावत करते हुए गाँव के ही मिडिल स्कूल में जा बैठा और फिर मिडिल बोर्ड परीक्षा पास करके ही स्कूल से बाहर निकला था। इस तरह की बोर्ड परीक्षा पास करने वाला गाँव का पहला मुस्लिम लड़का था वह। बाप का मन एक बार फिर शमशुल के सिर पर मौलवी की टोपी देखने को ललक उठा था। उधर उसकी अम्मा जान अपनी बहिन बेटी को घर की बड़ी बहू बनाने का सपना पाल रखा था। बाप बेटे के सिर पर मौलवी की टोपी तो पहना नहीं सका। परन्तु उसकी मां का सपना नहीं टूटा था।
उन दिनों कोयला खानों में कोयला काटने- ढोने और नगद पैसा कमाने का बड़ा शोर था। प्रावेट खान मालिकों ने अपनी ओर से गांवों में दलाल छोड़ रखे थे, खान मालिक उन्हें प्रति मजदूर दस- बीस रूपये बतौर कमीशन दिया करता था। बदले में खान मालिक उन मजदूरों से जान- वसूली काम लेता था। क्योंकि ऐसी खानों में काम करना बड़ा ही जोखिम भरा होता, खानों में सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं होता, नियम- कानून सब खान मालिकों की जेब में होते, यहां तक कि खान में किसी की जान भी चली जाती तो पुलिस को खबर तक नहीं होती। पत्रकार खदानों में झाँकने तक नहीं आते । नतीजा लाश ही गायब करा दी जाती थी।
उसी तरह की एक खान में शमशुल ने कदम रखा था। जहां खान के सुपरवाइजर के ये पूछने पर कि ” झोड़ा ढोना आता है..? ” के जवाब में उसने कहा था-” हां, हां, कोयला काटना, झोड़ा ढोना मुझे सब आता है। ” इस पर उसके साथी ने जो उसे साथ लेकर आया था कि पूछने पर ” पढ़ा- लिखा हूँ। ” नहीं कहने पर बिगड़ गया -” तुम गधे हो, पढ़ाई- लिखाई वाली बात तुमने क्यों नहीं कही..? “
शमशुल इस पर चुप हो गया था। न जाने क्यों? और जब खदानों का सरकारीकरण हुआ और कम पढ़े लिखे लोग भी पैसे दे देकर अच्छी जगह हथिया रहे थे, तब भी शमशुल ने मैनेजर का जीप चालक बनना पसंद किया था- ” तुम पढ़ा लिखा था, तुमको पढ़ाई लिखाई वाला काम मिल सकता था, पढ़ाई की बात छुपा कर तुमने अच्छा नहीं किया “
एक साथी के बिगड़े जाने पर उसने कहा था -” तब यहां के लोगों को पुटूस जिला का गंवार आदमी कहा जाता था। एक ऐसा आदमी जो पढ़ाई लिखाई के बारे में कुछ नहीं जानता है। ऐसे में पढ़ा लिखा काम हमें कौन देता। सभी अच्छी जगहों पर बाबू लोगों ने कब्जा कर लिया था। सिर्फ नाम लिखने वाले तक को मुंशी बना दिया जाता था। “
यह वह दौर था जब यहां के लोग मालिकों के जूते उठाना जानते थे- पहनना नहीं।
खदान में काम करते हुए शमशुल के जीवन का एक युग बीत गया और समाज में उसकी उपस्थिति अनिवार्य हो गयी। समाजिक फैसलों में उसका कहा काजी का कहा जैसा सुना जाने लगा। तब उसे समझ में आया कि पैसा बड़ी चीज है। यह सब उसके जीवन में किसी नाट्य रूपांतरण की तरह ही था। और एक दिन ऐसा भी आया जब वह अपने जाति समाज का सदर बन बैठा। तीन में से यह उसके जीवन की पहली उपलब्धि थी, जो उसके व्यक्तित्व को बेहद प्रभावशाली बनाने के लिए काफी था।
इधर कोयला खानों में सरकारीकरण के बाद दूसरा दौर शुरू हुआ था, – मशीनीकरण का दौर ! कोयला मजदूरों ने पहली बार काम करने वाले मशीनों को देखा, डम्फर, शॉबल, ड्रील और पॉकलेन को,
-” काम करने में मजदूरों को सुविधा होगी ” कहा जाने लगा था।
शमशुल जीप चालक से सीधे शॉबल आपरेटर बन गया था। यह उसके जीवन की दूसरी बड़ी उपलब्धि थी। अपनी बहाली से लेकर अब तक शमशुल मकोली खदान में ही अंगद की तरह जमा हुआ था । इसमें लगभग चालीस वर्ष की एक हसरत भरी उसकी उम्र भी शामिल थी। और रिटायर होने में अब महज डेढ़ साल का समय उसके हाथ में रह गया था। और वह उथल पुथल के दौर से गुजरने लगा था। समाज में तो सम्मान प्राप्त था उसे लेकिन घर में अपमान और क्षोभ से दम घुटता उसका। उनके सामने अपाहिज बेटी की शादी और इकलौते बेटे का जीवन को संवारने का सवाल उसका सुख चैन छीन रहा था। खाने के साथ बीवी रोज ताने भी परोसती थी, -“अगर जीते जी बेटे को कहीं नौकरी नहीं लगा सके तो लानत है ऐसी नौकरी और ऐसे जीवन पर..! “
शमशुल भी बेटे को किसी पोस्ट में देखने की तमन्ना रखता था । लेकिन हालात उसका साथ नहीं दे रहा था। विकलांग बेटी की चलने की पटरी नहीं मिल रही थी और बेटे को उतराधिकारी बना सके ऐसा कोई धारा फीट नहीं बैठ रहा था । यह उसके जीवन का सबसे मुश्किल दौर था। और बंद दरवाजे खोल कोई वसीयत लिखा नहीं जाता।
जैसा कि शमशुल के रिटायरमेंट में डेढ़ साल से भी कम समय रह गया था। जैसे- जैसे उसका समय घटता जाता। शुगर- डायबीटिज उसे कुछ ज्यादा ही परेशान करने लगा था। ऊपर से घटते- बढते रक्तचाप का मामला, परेशानी का सबब बना हुआ था। उसके साथी हेल्पर सोमर कहता, -” इन बीमारियों को हल्के मत समझो उस्ताद! बड़ी हरामी होते हैं, ऐ बीमारियां ! इसका समुचित इलाज जरूरी है। “
सोमर ने कह तो दिया, परन्तु उस्ताद का उत्तर उसे मालूम था-” शरीर है तो बीमारी भी रहेगा सोमर,किस- किस का इलाज कराऊं..! ” शमशुल के सामने दो ही बडे़ सवाल थे। अपाहिज बेटी के बंजर जीवन में पौधे उगवाना और बेटे समशुदीन के जीवन का सेटलमेंट! और यह दोनों काम शमशुल के लिए किसी गहरे समुद्र से तैर कर बाहर निकलने के समान था । ऐसा नहीं था कि बेटे के लिए उसने कुछ नहीं किया। बहुत कुछ किया, अपनी जगह बदली तौर पर नौकरी देने हेतु क्षेत्रीय कार्यालय में आवेदन जमा किया। मेडिकल कराई। परिणाम अपने पक्ष में करवाने की गरज से यूनियन के एक बड़े नेता की पैरवी भी कराई। कइयों के साथ उसकी भी डॉक्टरी जांच हुई। परन्तु परिणाम निकला तो उसके आगे अंधेरा और गहरा गया था। डॉक्टरी जांच में उसे काम करने योग्य पाया गया था ” शमशुल इज फिट फोर डियूटी ” जांच रिपोर्ट में लिख दिया गया था।
दस हजार लेकर परिणाम उसके पक्ष में करा देने का दावा करने वाला वह नेता भी गधे की सींग की तरह गायब हो चुका था । शमशुल के जीवन में निराशा के बादल और घने होते चले गए थे। उसी अनुपात में उसकी जिन्दगी भी उलझती चली गई थीं । उसका मानसिक संताप बढ़ने लगा था। एक दिन बाजार से लौट रहा था। तभी उसे चक्कर आ गया और एक स्कूटर से टकरा गया। चोट से स्कूटर चालक का माथा फट गया। मामला थाने में जाने के बाद निबटा । साथियों ने सुना तो उसकी मानसिक हालात पर अफ़सोस जताई। कुछ ने नसीहतें भी दी । परन्तु अब शमशुल के साथ घटने वाली घटनाओं पर ज्यादातर की सोच में बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था । उनकी हाले- हालात के बारे सबको पता था। और वह तनाव के भंवर में डूबता- उठता रहा।
उस दिन यूनियन के वार्षिक समारोह में उसे बोलने का मौका क्या मिला, अपने ही नेताओं के निशाने में आ गया। उसने कहा था, -” यह कैसी विडम्बना है साथियों, हमारे ही बडे़ नेता ऊपर बैठ कर हमारी ही सुविधाओं की कटौती कराने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रहे हैं । और हमें यहाँ भाषण पिला पिला कर बेवकूफ बनाया जा रहा है। आज प्रबंधन के साथ दलाली कर हमारे नेता अपनी तिजोरियां भर रहे हैं और हक अधिकार से हमें वंचित किया जा रहा है..! ” बोलते बोलते वह हांफने लगा था, -” साथियों, नेताओं के चरित्र को पढ़ना होगा, उनके क्रिया- कलापों पर सबको नज़र रखनी होगी, वरना, मेरी तरह आपके बेटे को भी बदली में नौकरी नहीं मिलेगी- नाक रगडनी होगी..? ” और वह बैठ गया था। कुछ ने उसे बिठा देना भी कहा था।
सभा स्थल के बाहर एक युवक ने पूछा -” आप किसके बारे कह रहे थे..? “
” वही जो मजदूर मसीहा होने का दंभ भरते है- राजदेव और कौन..? “
” परन्तु वह तो इस यूनियन का सर्वमान्य नेता है, कल इंडिया में उसकी धाक है, प्रबंधन भी डरती है, फिर भी आप उसके बारे में ऐसा कह रहे हैं..? ” पूछने वाला युवक चकित था।
” तुम अभी अभी आये हो, नये भी हो धीरे धीरे सब जान जाओगे, थोड़ा इंतजार करो, संक्षेप में इतना जान लो जब वह इस बेरमो क्षेत्र में आया था, तब होटलों में दूध पहुंचाने का काम किया करता था। वहीं लकड़ी की बैंच पर बैठ सिंघाडा- चोप खाया करता था। पता करो, मजदूर धौड़ों में जाकर वह चुड़ियाँ भी बेचा करता था। यही सच्चाई है राजदेवा की..! ” शमशुल का बचा खुचा भाषण बाहर शुरू हो गया था, -” और सुनो, बाद में वह पार्टी का झंडा- बेनर बांधने का काम करने लगा, जहां से उसे खाना और कुछ पैसे मिल जाया करता था। फिर उसी पार्टी यनियन के एक नेता का लठैत बन गया, बैग ढोना और देह पर तेल मालिश करना भी उसी का काम था, उसने अपने जीवन में कभी कोई मजदूर आंदोलन नहीं चलाया, बस खुद चलता रहा, जहां न कोई पहुंच पाए, वहां चमचा पहुंच जाए। वह भी मजदूर नेता का चमचा था । पहुंच गया इस मुकाम तक ! और यहां तक पहुंचाया किसने.. हम मजदूरों ने, आज वो कहां है और हम मजदूर कहां खड़े हैं और हमारे अधिकारों को कौन छिन रहा है..? कभी सोचना..! “
शमशुल पुनः चुप हो गया था। देखा राजदेव अपने अंगरक्षकों के साथ बाहर आ रहा है। उसने शमशुल पर एक तीखी नज़र से डाली और गाड़ी की तरफ बढ़ गया था।
उसी तरह की एक रात थी। तल्ख़ और तनाव से भरी। पिछले एक सप्ताह से शमशुल के दिमाग़ में एक मंथन सा चल रहा था। बल्कि यूँ कहें कि मेडिकल में फिट हो जाने के बाद से ही वह इस पर सोचना शुरू कर दिया था। परन्तु इस नतीजे तक पहुंचना एक लम्बी यात्रा तय करने के समान था। और एक दिन धड़कते दिल के साथ उसने अपनी योजना का प्रारूप पत्नी के सामने रखा और इस कदर चुप हो गया जैसे कह रहा हो कि देखो, मेरे मन में बेटे के जीवन को संवारने की कैसी तमन्ना है। लेकिन उसकी बीवी का जवाब उतना ही उदास करने जैसा था -” तोहरा, ऐ सोचना भी बेकारे जितो, तोरा पता नाय हो, तीन दिन पहले सदरडीह के बालो महतो के बेटा के कंपनी ने काम से बिठाय देले, ओ भी बेटा के नौकरी दिये खातिर आठ साल से कहीं छिपल हलय, गाँव- टोला सगरो ओकर मरन की खबर फैलाय देल गेल हलय, थाना से मिलल मरन परमान पतर पर ही किसना के नौकरी मिलल हलय, बेटा के नौकरी लागते ही एक दिन बालो महतो घर आ गेलय, कोलियरी में कोई इटा के चुगली कर देलय…! “
वह रात शमसुल के जीवन की सबसे काली रात थी। उसकी रात्रि पाली शुरू हो गई थी। समय पर वह काम पर पहुँच कर सिफ्ट पकड़ लिया था। हांलाकि उस दिन उसके नाम पर शॉबल मशीन बुक नहीं था। जोर डालकर उसने अपने नाम शॉबल बुक कराया था। इंचार्ज से कहा -” सर, आज मेरे नाम से बुक कर दें, कल से कुछ दिनों के लिए मैं छुट्टी पर रहूंगा। ” कहा और सिफ्ट गाड़ी पर जा बैठा। उस वक्त उसके मन में विचारों का एक सैलाब सा उठा हुआ था। फिर जो हुआ वो सबके सामने है।
इधर उसका हेल्पर सोमर, अपने उस्ताद का अंतिम गवाही दे रहा था -” उस्ताद, तीन बजे भोर तक लगातार शॉबल चलाते रहा, बिना रूके, बिना थके, जैसे इस रात के बाद फिर कोई रात उसके हिस्से नहीं आयेंगी। मैंने एक दो बार उन्हें टोका भी, रेस्ट करने की बात भी कही। लेकिन ” सुबह तक इस फेस को समतल कर देना है, तुमको सोना है, तो शेड में जाकर सो जाओ, मैं गया भी, लेकिन मशीन की आवाज मुझे सोने नहीं दे रही थीं। अभी अभी उस्ताद ने एक डम्पर को लोड़ दिया था। फिर वह मशीन से नीचे उतरा, लाल गमछे से उसने अपनी देह झाड़ी और वहीं जमीन पर गमछी बिछा कर लेट गया। उसी वक्त पहाड़ी पर ओ. बी, फेस में काम कर कमलेश मिश्रा डोजर लेकर नीचे उतर रहा था। अभी वह शॉबल मशीन के बगल से गुजर ही रहा था कि तभी एक भयानक मानवीय चीख ने पूरे खदान को जगा दिया था..! डोजर उस्ताद को सड़क के गोबर की भांति पिस्ता हुआ आगे बढ़ गया था..! “
” उस घड़ी, मुंशी या माईनिंग सरदार कोयला फेस में कोई नहीं थे..? ” किसी पत्रकार ने पूछा था।
” रात्रि पाली में कोयला फेस में कभी कोई आये, कभी नहीं, हाजरी लगा ज्यादातर हाजरी घर में ही पडे़ रहते हैं..! ” सोमर ने बताया था ।
पन्द्रह दिन पहले ही शमशुल अजमेर शरीफ में चादर चढ़ा कर लौटा था। परन्तु उनकी चाल भटके हुए राही की माफिक था। एक ऐसा आदमी जिसने जीवन तो पा लिया लेकिन जीने की राह न पा सका था। हर- हमेशा द्वन्द्व में घिरा प्रतीत होता था।
एक रात एक बात पूछा था उसने पत्नी से, -” क्या मैं तुमलोगों की जरूरत की चीज हूँ..? “
” जरूरत तो हो- पर उससे भी ज्यादा जरूरी बेटे की नौकरी की है, लेकिन वो तुम दे नहीं सकते..? “
” भगतु गिरी के घर वालों को कल पांच लाख रुपये किस लिए मिले क्या तुम जानते हो? ” पत्नी ने ही सवाल किया।
” हां, खदान में एक्सीडेंट से मरने पर यह रूपये मिलते हैं..! ” शमशुल ने बताया।
” कल मैं भगतु गिरी के घर गयी थी। उनके घरवालों को देख लगा नहीं कि उस घर में किसी की मौत हुई है..! सभी खुश थे “
” और तुम भी चाहती हो कि मैं भी खदान में..? “
” मैंने ऐसा तो नहीं कहा..? “
शमशुल उस रात सो नहीं सका था। सारी रात करवटें बदलता रहा।
दिन चढ़ने के साथ ही खदान में गहमागहमी काफी बढ़ गई थीं। भीड़ के बीच शमशुल की क्षत- विक्षत लाश को किसी तरह समेट कर सादे कपडों में बांध दी गई थी। पत्नी, बेटा और बेटियां सब पहुँच चुके थे। सबके चेहरे बुझे- बुझे और आंखें नम थीं सभी की। ऐसी दर्दनाक मौत खदान में इसके पहले कभी नहीं हुई थी- ऐसा लोगों के मुंह से निकल रहे थे। तभी युवा श्रमिक नेता जगत महतो ने भीड़ के बीचों- बीच आकर कहा -” शमशुल का नाता खदान से खत्म नहीं होगा, लाश उठने के पहले उसके बेटे समशुदीन को नियुक्ति पत्र प्रबंधन को देनी होगी..! “
विधायक राजदेव ने भीड़ की ओर देखा जिसे जगत महतो ने हाइजैक कर लिया था। वह अपने अंगरक्षकों के साथ धीरे से गाड़ी की ओर बढ़ गया । अब सभी को मुख्य महाप्रबंधक अंसारी साहब का आने की प्रतीक्षा थी। कहा गया था कि वह हेड-क्वाटर से कोई संदेश लेकर आने वाले हैं। मजदूरों ने भी तब तक लाश को न उठने देने का निर्णय ले लिया था।
कुछ ही देर में अंसारी साहब की गाड़ी आती दिखी। फिर बड़ी तेजी से घटना क्रम बदला। महाप्रबंधक अंसारी साहब का चेहरा खुशी से दप- दपा रहा था। उन्होंने जगत महतो और मजदूरों की भीड़ की मौजूदगी में शमशुल के बेटे समशुदीन को नियुक्ति पत्र देते हुए कहा -” समशुदीन, तुम आज से नौकरी पर बहाल हो, हेड-क्वाटर से यह फेक्स लेटर आया है..। “
सभी मजदूरों ने जयकारा लगाया। पर पता नहीं सोमर को कोई खुशी नहीं हो रही थी.. सोमर शमशुल का अटूट मित्र- उसका हेल्पर! वह बड़ी देर तक नियुक्ति पत्र थामे शमशुल के बेटे, उस खूनी डोजर और शमशुल के मुर्दा चेहरे की ओर देखता रहा और उसे लगा कि मुस्कान की एक पतली सी रेखा वहां अब भी मौजूद है..।
— श्यामल बिहारी महतो
