संस्मरण : दारू गगन की छांव
बाप जब भी दारू पीकर घर आता, मुझसे एक ही बात कहता ” बेटा, मैं तुम्हारा दिया नहीं उडाता हूं
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Read Moreबहुत साल हो गया गुरु जी को हमने याद नहीं किया। और गुरु जी को भी हम कहां याद रहे
Read More“मैनवा” यही उसका बपौती नाम था। नाम के पीछे छुपे कारनामों का पता आपको खुद ब खुद लग जायेगा। पैंतालीस
Read Moreचुटकी भर सिन्दूर की कल्पना मात्र से कभी- कभी किसी की विरान जिन्दगी में किस तरह खुशियों के रंग भर
Read Moreसुबह का आसमान साफ हो चुका था । तिलक महतो घुमते हुए बांध की ओर चले गए थे । बांध
Read Moreवह तीनों टाइम नशे में धूत रहता था। कभी कभी बेहद नशे में उसे देखा जाता। वह चलने की हालत
Read Moreउस भिखारी से यह मेरी पहली मुलाकात नहीं थी, इसके पहले भी हम दो बार मिल चुके थे। अपने ही
Read Moreचार दिनों से मैं भारत दूर संचार निगम लिमिटेड के आफिस का चक्कर लगा लगा कर थक चुका था। आज
Read Moreहादसा जब हुआ, मैं अठारह की थी और मैट्रिक की परीक्षा की तैयारी में लगी हुई थी। ” अच्छे नम्बर,
Read Moreखैरी गैया की आँख से बहते आँसू देख अचानक से बासु चौंक उठा था। तत्काल उसे समझ में नहीं आया
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