कहानी – पंचायतनामा
“मैनवा” यही उसका बपौती नाम था। नाम के पीछे छुपे कारनामों का पता आपको खुद ब खुद लग जायेगा। पैंतालीस के आस पास उम्र थी उसकी। सांवला चेहरा, चंचल हिरनी सी आंखें और झील सा सब कुछ समाहित कर लेने वाली देह थी- ऊपर से शांत मगर भीतर उतनी ही उथल पुथल!
कुछ माह पहले वह मेरे घर आई थी। उसके पहले उसको लेकर एक फोन आ गया था। उसका पति मर चुका था और उसकी जगह खुद नौकरी करने का पक्का मन बना कर आई थी। पक्का इसलिए कि उसके तीन तीन बेटों के रहते वह खुद को नौकरी करने की काबिल समझ रही थी या उसे समझा दिया गया था
फोन पर मुझे इतना ही बतलाया गया था कि यह औरत अपने ही रिश्तेदारों में से एक है। अतः हर तरह से उसकी मदद की जाए। लेकिन मदद किस स्तर का हो यह फोन में खुलासा नहीं किया गया था। और अपनी तो आदत है, जिसकी मदद की जाए ऐडी से चोटी तक नाप कर मदद की जाए, जेब खोलकर मदद तो सारी दुनिया करती है।
दूसरी ओर से पंचायतनामा का जीरोक्स भी मेरे पास पहुंच चुका था। उसी के साथ क्षेत्र के विधायक का फरमान भी मिल चुका था” पंचायतनामा” के आधार पर आपको सारे काम करने है, एक इंच न उधर न एक इंच इधर!”
देर तक मैं मैनवा का हाव भाव देखता रहा और उसके मनोभाव को टटोलता भी रहा-“तो नौकरी तुम खुद करोगी? कितने बच्चे हैं?”
“एक बेटी और दो बेटे – बस!”
“लेकिन हमें तो बताया गया चमन के तीन बेटे और एक बेटी है!”
“नहीं, मेरे दो ही बेटे हैं और एक बेटी है!”
वह अपनी बात पर अड्डी दिखी।
“फिर तीसरा बेटा किसका है?”
“किसी का भी हो, पर मेरा नहीं है!”
“क्या वह चमन महतो का पुत्र नहीं है?” मैनें जोर दिया था।
“यह उसी से जाकर पुछिये!” उसमें चिड़चिड़ापन
आ गया था।
“क्या यह संभव है?” मैंने कंखोरी की तरह उसे देखा और फिर बोला” “दो दिन पहले वह लडका भी अपनी माँ के साथ यहां आया था- राशनकार्ड, वोटर कार्ड और स्कूल सर्टिफिकेट सब में बाप की जगह चमन कुरमी लिखा था।”
अकस्मात गर्दन मरोड दी गयी चिड़िया की तरह मैनवा का चेहरा मुर्झा गया और आंखों की पलकें भींगने लगी थी। इससे पहले की वह रोये,
मैंने आगे कहा -“ऐसा करो, तुम अपने पास के सारे कागजात हमें दे रखो, पंचायतनामा है न इसमें, ठीक है, अब तुम जाओ, कल संडेय है, परसों आफिस में आकर मिलो। और हां, बड़े बेटे को साथ लेकर आना, तब तक हम पूरे मामले को समझ- बूझ लेते हैं। फिर सोचेंगे कि किस तरह से तुम्हारी मदद की जा सके- ठीक!”
इसके बाद मैनवा चली गयी थी। लेकिन उसकी कुछ बातों ने मुझे चौंका दिया था। खासकर नौकरी की चाहत ने।
उनका पति चमन कुरमी तारमी कोलियरी में एक मलकटा का काम करता था। मतलब लोडर था। उसे दो चीजें बहुत पसंद थी। दारू और देह! इसके बीना वह एक दिन भी नहीं रह पाता था। पहनावे में भी अजुबा। खाकी का हाफ पेंट और हाफ कुर्ता जोकर की भांति बारह माह शरीर में पहने रहता। काम पर जाता तब भी और मेहमानी में जाता तब भी। इस मामले में वह पूरा एक मॉडल था। चमन बड़ा चिमटू और चतुर भी था। जिसके साथ एक बार चिपक जाता, बड़ी मुश्किल से उसका साथ छुट पाता था। वह मुझसे भी चिपका हुआ था। मुफ्त में कोई भी काम करवा लेता। उसका हर आफिसीयली काम झख मारकर मुझे करना पड़ता। हां, अंदरूनी बातें भी वो मुझे बेधड़क बता देता था। लेकिन मैनवा के मामले में उसने मुझे भी अंधेरे में रखा और गुमराह कियाथा-
“पहली पत्नी के रहते तुमने दूसरी शादी कैसे कर ली? कानूनी तौर पर यह गलत है। और तुमने गलत किया है।” दूसरी शादी का कागजात लेकर आया तो मैंने उसे खूब डांटा- फटकारा, पर वह शुतुरमुर्ग की भांति मूडी झुकाये खड़ा रहा, -“तुमने पहली पत्नी और पहले बेटे का नाम तक नहीं चढाया। जबकि उनका पहला हक बनता थाक्यों?”
“वह मेरी पत्नी होकर भी मेरी नहीं थी।” उसने मुंह खोला था-“बेटा हुआ तब भी वह नैहर में थी, मैं बीमार पडा, तब भी वह मेरे पास नहीं आई। जब भी लेने जाता, वह फूफी घर भाग जाती या फिर मौसी घर में जा छिपती। काम से हम थका हारा घर आता, पानी कौन देता, खाना कौन बनाता, माँ बूढ़ी हो गई है। काम से थकान बदन में तेल मालिस कौन करता। घर में एक औरत होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए?” अपनी सफाई देकर उसने मेरा मुंह बंद करना चाहा था। परन्तु मैं उसकी वो बात भी जानता था, जो बहुतों को नहीं पता था” तुम्हारी उस हरकत ने ही उसे भागने पर मजबूर कर दिया था। दोष उसका नहीं, तुम्हारा था, अपनी सगी औरत के साथ ऐसा भी कोई करता है” मैं उसे लपेटना चाहा था।
“वो झूठी बात है!”
“तुम झूठे हो, उसने सब कुछ मुझे बता दिया था!”
इतना कहने भर की देर थी कि अपनी सर्विस सीट में दर्ज कराने वाला दरखास्त और कागजात वह मेरे टेबल पर छोड़ कर भाग गया था।
उसे पता था कि मैं आगे क्या कहने जा रहा हूँ। चमन नशेड़ी, गंजेड़ी तो था ही, सबसे बड़ा अय्याश भी था। जिस दिन वह ज्यादा पिया होता, मिलन के नाम पर पत्नी का खूब यौन शोषण करता। और ऐसा हर रात करता। उसकी हरकतें तो कभी कभी सारी हदें पार कर देती थी। एक रात तो उसने हद ही कर दी। मिलन के दौरान मिर्ची का गोला जो उसने पहले ही तैयार कर रखा था, पत्नी अहिल्या की यौनी में अचानक बेलन से अंदर ठेल दिया। अहिल्या जलन से चीख़ पडी़ और बाहर भागी, फिर आंगन के कुंए में छलांग लगा दी। तब अहिल्या तीन माह पेट से थी। अगले ही दिन उसने पति का घर छोड़ दिया सदा के लिए।
वही चमन कोलियरी में जिस दंगल सरदार के साथ काम करता था, उसका नाम भैरव कुरमी था। वह भी एक नंबर का गंजेड़ी था। उसकी तीन बेटियां थी। उनमें सबसे छोटी मैनवा थी। चौदह साल की उम्र में ही उसका नाम गाँव के भिन्न भिन्न लडकों के साथ जोडा जाने लगा था। मनचले लडके मैनवा को महारानी कहते थे। भैरव कुरमी का गाँव में बड़ी थू- थाह होने लगी थी। वह किसी भी तरह से इस बला को गांव से दूर भेजने की जुगाड़ में लगा हुआ था।
चमन अपनी दूसरी शादी की बात भैरव कुरमी से पहले भी कई बार कह चुका था। लेकिन तब उसके आंगन में अहिल्या का आधिपत्य था। चमन भी भैरव कुरमी को पसंद नहीं था। परन्तु अब अहिल्या चमन की चौखट को अलविदा कह चुकी थी।
चमन का भैरव कुरमी के घर आना जाना भी कभी बंद नहीं हुआ था। कभी कभी चमन तो भैरव कुरमी के आंगन में रात भर पीकर पडा रहता था। पहले तो भैरव कुरमी को चमन पर बड़ा गुस्सा आता था। लेकिन अब प्यार आने लगा था। इसी बीच एक दिन चमन ने रात को भैरव कुरमी का पैर पकड़ कर रोने लगा-“सरदार, मुझे मैनवा दे दो, उसे रानी बना कर रखूंगा!”
भैरव कुरमी को और क्या चाहिए था बैठे- बिठाये नौकरी वाला दामाद मिल गया। उसने तुरंत हां तो कर दिया। लेकिन एक शर्त के साथ -“ठीक है, आज से मैनवा तुम्हारी हुई, लेकिन एक शर्त है, अपनी सर्विस सीट में मैनवा के ही बच्चों के नाम चढाओगे, और मैनवा का नाम तो शादी के बाद ही तुम्हें चढाना होगा!”
” बस हमें आपका आशीर्वाद चाहिए, बाकी आप जैसा चाहेंगे, वैसा ही होगा!” दरवाजे के पास मैनवा को खडी़ देख चमन आंगन में ही नाचने लगा था।
इस तरह बाप की मुंडेर से उडक़र मैनवा सीधे चमन के खुले आंगन में आ उतरी। अहिल्या ने सुना तो भागी भागी आई। यह उसके जीवन में किसी भूचाल से कम नहीं था। पर अब होत क्या? साजन और आंगन दोनों उसका छिन चुका था। ताला चाभी पर मैनवा का कब्जा हो चुका था। अहिल्या किसी परकटे पक्षी की तरह तडफडा कर रह गई थी।
गाँव में एक कहावत है:- एक नारी, ब्रह्मचारी, दो नारी गां@ड फारी और तीन नारी जान मारी” पर चमन के जीवन में तीसरी नारी का आई भी नहीं और उसकी जान चली गयी।
कंपनी नियम के तहत चमन की जगह नौकरी कौन करे। यहां मामला कुते- कुतिया जैसी हाल में फंस चुका था। यधपि गाँव का पंचायतनामा नौकरी का आधार बना था। ऊपर से मुझे विधायक जी का मैसेज मिलना किसी अंधे को लाठी मिलने के समान था।
पंचायतनामा के हिसाब से अहिल्या देवी को पैसे मिलने थे और मैनवा के हिस्से में नौकरी और पेंशन आया था। मैनवा के नाम से बैंक में खाता भी खुलवा दिया गया था। पूरा मामला मेरी समझ में आ चुका था। अब मुझे उसी आधार पर काम को अंजाम तक पहुंचाना था जो इतना आसान भी नहीं था।
दो दिन बाद मैनवा को बेटे के साथ आफिस आना था। आई भी, लेकिन बेटे के साथ नहीं, गाँव के एक अन्य युवक के साथ!
“आ गयी, मैं तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था।”मैनवा को देखते ही मैने कहा था-“यहां भी सब पेपर तैयार है। यह तुम्हारा बेटा ही है न?”
“यह बेटा नहीं, भैंसुर बेटा है!” उसने झट से कहा था।
“लेकिन तुम्हें तो बेटे के साथ मैने आने को कहा था?” मै कुछ अनमना सा हो उठा। तभी उस लडके पर मेरी नज़र गयी, वह कहीं से शरीफ नहीं लगा। उसकी आंखें उस हुंडार जैसी थी, जो हमेशा बकरियों की तलाश में रहता हो।
“नौकरी वाला फारम आपने किसके नाम भरा है?” अचानक से उसने पूछा था।
“तुम्हारे बेटे काशी के नाम पर ही भरा हूँ देवी, तुम्हारी सौतन के बेटे के नाम नहीं!”
“नहीं, नहीं, नौकरी काशी नहीं, मैं करूंगी, इसे बदलिये नहीं तो मैं साइन नहीं करूंगी!” वह लगभग चीख पडी़ थी -“किसने कहा था आपको काशी के नाम फारम भरने को?”
“पर काशी तो तुम्हारा ही बेटा है न!”
मैं अवाक कुछ पल तक उसे देखता रहा। वह भी कम बैचेन नहीं थी। कभी वह उस लडके को देखती तो कभी मुझे घूरने सा करती।
“आखिर तुम खुद नौकरी करना क्यों चाहती हो?” मैं थोड़ा सहज हुआ तो पूछ बैठा-“जबकि घर में काम करने योग्य बेटा बैठा है, लोग जानेंगे तो क्या सोचेंगे?” मेरा अगला सवाल था।
“लोगों को अच्छा – बुरा कहने की आदत है, परन्तु कहने वाले कोई किसी का घर चला नहीं देता!” तडाक से वह बोल उठी। मैं आश्चर्य से उसका मुंह देखने लगा। वह तर्क पर तर्क दे रही थी -“काशी की चाल – चलन ठीक नहीं है। वह बिगड़ गया है। और छोटकन की अभी उम्र नहीं हुई है!
“अंकल, माँ को रोकिये, वह खुद नौकरी लेने आ रही है, अगर ऐसा हो गया तो हम तीनों भाई- बहन का जीवन नरक बन जायेगा!”
दोनों मां बेटे के तर्क ने मुझे उलझा दिया था। कल मैनवा का बड़ा बेटा काशी मेरे घर आया था। वह मेरे सामने खड़ा काफ़ी देर तक रोता रहा।
” आखिर तुम्हारी मां खुद नौकरी क्यों लेना चाहती है?” मैने काशी से राज उगलवाना चाहा था।
“मेघु यही चाहता है!”
“अब यह मेघु कौन है ?”
“हमारा चचेरा भाई है।”
“पर तुम्हारा चचेरा भाई ऐसा क्यों चाहता है ?”
“मां का उसके साथ गलत संबंध है।”
एक पल के लिए मेरे दिमाग का उर्जा पुर्जा हिल गया था। मां बेटे को बिगडा़ हुआ बता रही है और बेटा मां पर घोर गंभीर लांछन लगा रहा है। अब मैं गहरी दुविधा में पड़ गया था। मैं थोड़ा सहज हुआ तो मेरा ध्यान फिर उस मेघु पर चला गया। गला खखारते हुए मैनवा को फिर समझाने का एक असफल प्रयास किया-“देखो मैनवा, काशी तुम्हारा अपना बेटा है और वह तुमसे बाहर नहीं है, तुम उसे काम करने दो, तुम जैसा चाहोगी वो वैसा ही करेगा, चाहो तो तुम एक एग्रीमेंट उससे लिखवा लो, पर उसे नौकरी करने दो!”
“मुझे सभी को पालना पोसना है, नौकरी मैं ही करूंगी, ।” मैनवा का स्पष्ट जवाब था। उसने मेरी एक नहीं सुनी।
“ठीक है, तुम्हारी जैसी मर्ज़ी!” मैने उसे दो दिन बाद आने को कहा। वे दोनों जैसे हंसते हुए चले गए और मैं मैनवा की नौकरी पर विचार करने लगा। उस घोडिन को कैसे काबू पर लाना है। दिमाग मेरा घोड़े की तरह हिनहिनाने लगा था। तभी सोमरा चमार की कही बात याद आ गयी -“श्यामल बाबू, सुना मैनवा देवी आपके घर आई थी?”
“हां आई थी, कल उसे आफिस में बुलाया है।”
“वह खुद नौकरी लेना चाहती है, पर आप होने मत देना, नहीं तो चमन के बाल बच्चे सभी भूखे मर जायेंगे!”
“पर वो नौकरी क्यों करना चाहेगी? घर में नौकरी करने जैसा बेटा है!”
“मेघुवा यही चाहता है, दोनों के बीच गलत संबंध है!”
“यह मेघुवा कौन है?” मैने उससे भी पूछा।
“मैनवा का भैंसुर बेटा है!”
“भैंसुर बेटा है, फिर कहते हो दोनों के बीच गलत संबंध है?”
“हां, दोनों के बीच गलत संबंध है और यह सारा गाँव जानता है। चमन की जान भी इन्हीं दोनों ने ली है। चमन दोनों को कई बार रंगें हाथ पकड़ चुका था, भेद न खुले एक रात दोनों ने उसकी गला दबा दी और लाश ले जाकर कुंए में डाल दी गई। खबर फैला दी गई कि नशे में डूब मरा!”
“सोमरा तुम भांग तो नहीं खा लिया है, तुम कहता है, भैंसुर बेटा है। भैंसुर बेटा और काकी का मतलब समझते हो, मां – बेटा। उसके बीच गलत संबंधविश्वास नहीं होता!”
“आप भले न माने, लेकिन यह बात सारा गगनपुर गाँव जानता है!”
“बाप रे बाप। इतना बड़ा कांड कर चुकी है यह रांड!” मैं मन ही बुदबुदा उठा था।
दो दिन बाद मैनवा आफिस में फिर आ धमकी। उसकी चाल देखकर ही मैं समझ गया था कि इसको संभालना इतना आसान नहीं है। आते ही मैने कहा-“तो तुम फाइनल तय कर ली है, नौकरी तुम खुद करोगी?”
“यह बात कितनी बार बोलना पडेगा?” वह खिसिया उठी थी।
“ठीक है, इस फार्म में अपनी टिप्पी दे दो।”
“यह कौन सा फार्म है?” उसने पूछा।
“सी एम पी एफ काहै।” मैंने बताया।
“पहले नौकरी वाले फार्म पर टिप्पी दूंगी फिर सीएम पीएफ वाले फार्म पर। दोनों साथ साथ भेजने की बात हुई है!”
“लेकिन यह फार्म तैयार था।”
“लेकिन मैं तैयार नहीं हूँ।”
“गहरी ट्रेनिंग दी गई है लगता!” मैं मन ही मन बुदबुदाया था -“ठीक है, पांच मिनट तुम बाहर रूकोबुला लूंगा।” कह मैं अपने काम पर लग गया। वह बाहर के एक लकड़ी के बेंच पर बैठ गयी थी।
आधा घंटा बाद मैने मैनवा को अंदर बुलाया। नौकरी वाला उसका फार्म तैयार था। मैनवा को यह तो ट्रेनिंग दे दी गई थी कि नौकरी में पहला हक नोमनी का होता है पर उसे यह पता नहीं था कि उम्र की किस सीमा तक वह इसका हकदार बना रहता है। तय मुताबिक मैने सभी फार्मों पर मैनवा की टिप्पणी ले ली और उसे यह कहते घर भेज दिया था -“सप्ताह दिन बाद एक बार आफिस आकर पता कर लेना।”
सप्ताह दिन मैनवा का बड़ा मुश्किल से बीता। इस बीच उसका दो बार फोन आ चुका था।
“कोई खबर नहीं है” मैने दोनों बार उससे यही कहा।
उसके अगले ही दिन” नौकरी के लिए जरूरी उम्र पार कर जाने की वजह से मैनवा का आवेदन अस्वीकार किया जाता है ” दस दिन बाद मैनवा की नौकरी वाला आवेदन वापस लौटा दिया गया था। मैनवा को खबर हुई। वह मेरी खबर लेने आंधी तूफान की तरह आफिस में आ घूसी -“अगर इसमें आपकी कोई चाल हुई तो याद रखना, मै औरत नहीं आग हूँ। सारी सुख चैन जला कर राख कर दूंगी!!”
“देखो, शांत हो जाओ, बाद में पता कर लेना सब कुछ, पहले बेटे को बुलाओ, ऐसा न हो कि तुम दोनों मां बेटे आपस में लडते रहो और नौकरी कोई तीसरा ले ले!”
“तीसरा कैसे ले लेगा?”
“नियम है!”
“मैं सब समझ रही हूँ। नौकरी लेने से कोई मुझे रोक रहा है।” उसने कहा और वहीं फर्स पर बैठ गयी थी।
नौकरी उसे अब किसी भी सूरत पर नहीं मिल पायेगी, यह जान उसका दिल रो उठा था। देखा दो बूंद आंसू उसकी आंखों से ढलक पडे थे। उसकी मनोदशा की बंया करूँ तो वो मात खा चुकी थी। अब वो सब करने को तैयार थी जो मैं चाहता था। और पंचायतनामा में जो वर्णित था।
मां बेटे में सुलह हो गई थी। मां की कुछ शर्तों को बेटे काशी ने मान ली थी। गेंद अब पूरी तरह हमारे पाले में आ चुका था। महीना दिन बाद सीएमपीएफ की ढाई लाख की राशि मैनवा के बैंक खाते में आ गयी थी। अब उसे बैंक से निकाल अहिल्या देवी को देना था!
अपने जीते जी चमन ने पत्नी अहिल्या देवी को कभी एक फूटी कौड़ी न दी थी। अब ढाई लाख मिलने की खुशी में वे दोनों माँ बेटे एक सुखद भविष्य की कल्पना से मुग्ध हो रहे थे। उधर बैंक से पैसे निकाल कर गाँव के पंचों के सामने मैनवा को अहिल्या देवी को देने थे। बैंक से मैनवा ने पैसे निकाले भी। लेकिन पैसे लेकर जब वह गाँव लौटी तो उसका तेवर एक दम से बदला हुआ था। आते ही उसने दुर्योधन वाली घोषणा कर दी -“पति के कमाये पैसे पर सिर्फ मेरा हक है। मैं किसी पंचायतनामा को नहीं मानती!” और उसने पंचायतनामा की मूल प्रति को फाड़कर घर के बाहर बिखेर दिए-“नौकरी पैसा, सब पर सिर्फ मेरा हक़ है, किसी के बकने से क्या होता है? हम पंचायत के फैसले को नहीं मानते हैं!”
मैनवा ने जैसे पूरे गाँव वालों को चुनौती दे डाली
थी। मामला क्षेत्र के विधायक के पास पहुंचा। उनके मुँह से निकला-“उफिया को पर निकल आया है, कुचला जायेगी!”
मैनवा की इस ललकार ने पहले तो गाँव वालों को भी सकते में डाल दिया था। लेकिन पंच, पंच होता है। बाप दाखिल और उससे मुंह जोरी कर कभी कोई गाँव में सीना तान नहीं घूम सकता, सुकून की सांसें लेना भी मुश्किल हो जाता कभी कभी, फिर मैनवा ने तो पूरे गाँव से दुश्मनी मोल ले ली थी!
रात को मैनवा से मिलने मेघु आया। कहा-“बहुत सही जवाब दिया है तूने, फैसला ठीक से करना नहीं, सिर्फ पंच खर्चा चाहिए उन्हें?” मेघु ने मैनवा को बाहों में उठा लिया-“रानी, बस स्टैंड के पास वाली दुकान सेठ बेचने को राजी हो गया है!”
“तुम मेरा साथ तो नहीं छोड़ दोगे?”
“आखिरी दम तक निभाऊंगा!” मैनवा मेघु को लेकर विस्तर में घुस गयी।
दूसरे दिन शाम को पंचायत बैठी। मैनवा को बुलाया गया। वह नहीं आई। घर से ही बोल पठाई -“पंचायत से हमारा कोई लेना देना नहीं है। यह पंचायत नहीं, परखोकों का जमाडा है!”
क्षेत्र का विधायक क्षेत्र से बाहर थे। उडीसा दौरे में थे। अहिल्या टेंशन में, उसका बेटा टेंशन में। ढाई लाख के सपने, ढाई दिन में बिखर गया था। पैसा कैसे कैसे दिन दिखाता है। आज के दौर में पैसा से बड़ा कोई ताकतवर नहीं। क्या विधायक से भी ताकतवर है पैसा? ऐसा दोनों मां बेटे को महसूस हो रहा था। अहिल्या तत्काल चिंतित हो उठी। उसने विधायक को फोन लगाया -“सप्ताह दिन बाद लौटूंगा, तब तक शांत रहो!” उधर से जवाब मिला। विधायक का भी लहर उठा था!
इसी बीच मैनवा के बैंक खाते में ग्रेच्युटी के साढे़ तीन लाख रुपये और आ गया था। टोटल छह लाख की अब वह अकेली मालकिन थी। और उसका दिमाग़ सातवें आसमान पर था। कहा जाता है जिस औरत में दौलत और देह का घंमड आ जाए वो दूसरे के घड़ों को एडियों बल फोडती चलती है। परन्तु मैनवा को यह पता नहीं था। वह जिस घर में रह रही थी, उसे चमन के बाप मेघा कुरमी ने अपने जीवित काल में बनाया था। और जब चमन पन्द्रह सोलह साल का रहा होगा। तभी उसकी शादी कर दी गई। कारण तब तक उसे शराब और जुये की लत भी लग चुकी थी। बाप को डर था कहीं बेटा और न बिगड़ जाए। घर का समान संम्पति न जुओं में हार दे। घर में बहू रहेगी तो बेटा कंट्रोल में रहेगा। उसके बावजूद एक दिन कोर्ट जाकर उसने अपने घरबारी को बहू अहिल्या देवी के नाम पर लिख दिया। यह बात न तो अहिल्या देवी को पता था न चमन को। रजिस्ट्री कागजात उसने जमीन रजिस्ट्री में गवाह रहे अपने घनिष्ठ मित्र गोपाल कुरमी को रखने दे दिया था। संयोग से गोपाल कुरमी जीवित था। यह पूरा घरबारी बीस डिसमिल रकवा में फैला हुआ था। और ऊपजाऊ जमीन थी।
दो दिन बाद रात के अंधेरे में गोपाल कुरमी अहिल्या देवी के पास पहुंचा। जमीन रजिस्ट्री कागजात उसके हाथ में दिया। बोला -“तुम्हारी अमानत है बहू, तुम्हारे ससुर ने मुझे रखने दिया था। अब संभालो।” और इसी के साथ वह लौट गया था।
सप्ताह दिन बाद वही रजिस्ट्री कागजात विधायक जगतलाल के हाथ में था -“अब उस घंमड़ी औरत को उसकी औकात दिखाता हूँ। पंचायतनामा फाडी है न, अब देखो उसका क्या क्या फटता हूँ!”उसने अहिल्या से कहा -“आज ही शाम को पंचायत बुलाओ- जाओ!”
मैनवा को मालूम हुआ तो जैसे आसमान से सीधे जमीन पर चित। और आजू बाजू कोई उठाने वाला नहीं। सिर्फ अतल गहराइयों से कहकहों के स्वर उसके कानों से टकराने लगे थे।
पंचायत का माहौल बेहद गरम था। तीखी मिर्च मसाला जैसा। मैनवा को लेकर हर कोई गरम था। और सबों की कहानी अलग अलग!
लेकिन पंचों की राय एक थी -“मैनवा को गांव से बाहर निकाला जाए। इन्होंने पंचायतनामा फाड़कर न सिर्फ विधायक का अपमान किया है बल्कि पूरे पंचायत को लात मारी है। इसके आचरण से गांव का महौल भी खराब हुआ है!”
“जिस घर में वो रह रही है वह घर भी इसका नहीं है” किसी ने जोडा था।
“पंच परमेश्वर से मेरी विनती है, मेरा घर आज और अभी खाली चाहिए।” अहिल्या देवी ने दावा ठोका।
अब सबकी निगाहें क्षेत्र के विधायक जगतलाल पर जा टिकी थीं। जो किसी गहरी सोंच में डूबे हुए थे। जनता सर्वोपरि है। जिन्होंने वोट किया और जिन्होंने वोट नहीं किया विधायक वो सभी का थे। सभी की बातें भी उन्हें सुननी चाहिए। आशा की जा रही थी कि विधायक का फैसला दीर्घकालिक और सर्वमान्य होगा। इसी मदे नज़र खुद का फैसला सुनाने के पहले उन्होंने मैनवा को अपनी बात रखने का मौका दिया -“मैनवा तुम्हें कुछ कहना है?”पंचायत में बैठे सब चौंक उठे।
मैनवा हाथ जोड़ साष्टांग पंचों के आगे गिड़गिड़ा उठी -“आप सब हमारे बाप- भाई हैं, हमारी मति मारी गई थी। हम समाज को समझ नहीं सके, गलती कर बैठी। हमें माफ कर दी जाए, समाज के हर फैसले को हम मानने को तैयार है।”
“तुमने पंचायतनामा फाड़ दी, पंचों को परखोक कहा। फिर पंचायत तुझे क्यों माफ़ करे?” विधायक ने हुरकुटते हुए पूछा -“तुम किसके दम पर फूदक रही हो, चाहेगी तो अहिल्या आज तुमको बेघर कर सकती है, गली में भी खड़ा होने को तुम्हें जगह नहीं मिलेगी?”
मैनवा का मुंह न खुल सका। केवल माफी की मुद्रा में हाथ जोडे खड़ी रही।
“बोलो, जवाब दो!” मैनवा चुप।
“विधायक जी, पंचायतनामा में जो लिखा है, वही लागू करवा दीजिये, क्यों भाईयों!” मुखिया मंगर महतो ने कहा था।
“हां हां यही ठीक रहेगा!” पंचायत में सामुहिक स्वर गूंज उठा।
एक भरपूर नज़र पंचायत पर डालते हुए विधायक जी ने कहा-“मैनवा, तुम पांच लाख रुपये आज और अभी पंचों के सामने अहिल्या को देगी!”
“लेकिन पंचायतनामा में तो सिर्फ अढ़ाई लाख पैसा देने का लिखा हुआ था! *
“उसे तो तुमने पंचायत की धोती की तरह फाड़ दिया है!” मुखिया ने कहा।
“घर में रहना है कि नहीं?” इस बार विधायक का भारी स्वर गूंज उठा।
मैनवा के मुंह को लकवा मार दिया। वह धीरे से उठी और घर चली गई। लौटी तो उसके खोंइछा में पांच लाख रुपये मौजूद थे।
“मुखिया जी, पैसे गिनकर अहिल्या देवी को देने का पुण्य कार्य करें!” विधायक ने अहिल्या को आगे आने का इशारा करते हुए कहा।
“वो घर का कागजत!” इधर मैनवा ने फिर धीरे से मुंह खोला।
“वह मेरे पास है, मिल जायेगा तुम्हें।” विधायक ने कहा।
“पंचों की जय हो, पंचायतनामा जिंदाबाद!”
इसी के साथ पंचायत उठ गया। सबों ने अपने घर की राह ली।
मैनवा का पर कतर दिया गया था।
— श्यामल बिहारी महतो
