धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

विनय और विनम्रता से ज्ञान वृद्धि

सरस्वती का वरदान विनयशील को मिलता हैं इसलिए तो हंस मानसरोवर में मोती चुगता हैं। वि शब्द विशिष्टता को समेट कर साथ में रखता है | वह इसको लेकर चलने वाला जीवन में कभी नहीं थकता है। वि से विनय बनता है और वि से विनम्रता आती है और इतना ही नहीं वि के साथ विजय की महिमा भी जुड़ जाती है। वि हमें विराग का बेहतरीन भान कराता है, ऐसे में वि के साथ इस मानव जीवन का बड़ा गहरा व अटूट नाता है। हमारे जीवन में ज्ञान का बहुत महत्व हैं। ज्ञान एक पवित्र चीज होती हैं। ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमको प्रयास भी करना चाहिए। ज्ञान को हमेशा लगातार सुधारना, ललकार देना और बढ़ाना होता है, नहीं तो ज्ञान धीरे धीरे ग़ायब हो जाता है। ज्ञानी व्यक्ति ही अपने ज्ञान के वजह से ज्यादा बलशाली होता है। ज्ञान एक खजाना है और अभ्यास इसकी चाबी है। ज्ञान एक विलक्षण शक्ति है जिसे हम नहीं समझ सकते उसे समझना ही ज्ञान हैं। अतः ज्ञान से विनम्रता आती है और विनम्रता से पात्रता आती हैं। वह ज्ञान को बाटने से ज्ञान कभी खत्म नहीं होता बल्कि और बढ़ जाता हैं। आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी ने एक बार कहा था, विद्या ददाति विनयं भी सही है और विनयं ददाति विद्या दोनो ही सही है। सचमुच देखे तो विद्या से विनयं का और विनयं से विद्या का विकास होता है। आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी तो स्वयं एक उदाहरण थे, विश्व स्तर के दार्शनिक, प्रकांड विद्वान और विनम्रता की मिसाल थे। अनेक शिक्षा संस्थान है जहां से ज्ञान प्राप्त किया जा सकता हैं। हमको शिक्षा प्राप्ति के लिए बाधाओं से बचना चाहिए। आगम में शिक्षा की प्राप्ति में पांच बाधाएं बताईं गईं हैं। उनमे पहले है अहंकार। हमारे गुरु, पूजनियों और वंदनीयों आदि के समक्ष जब तक आदमी झुकेगा नहीं तो वह ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता हैं। वह जो विनयशील होता है वही विधा का अर्जन कर सकता हैं। इसलिए ज्ञान प्राप्ति में अहंकार एक बाधा हैं। ज्ञान प्राप्त करने के लिए आदमी के भीतर विनय और विनम्रता का भाव होना चाहिए। वह दूसरी बाधा क्रोध हैं। वह यदि विधार्थी को ग़ुस्सा अधिक आता हैं तो वह भी ज्ञान प्राप्ति में बाधा हैं। अतः विधार्थी को अपनी प्रकृति को शान्त रखने का प्रयास करना चाहिए। तिसरी बाधा हैं प्रमाद। जो विधार्थी प्रमाद में चला जाए और नशे आदि का सेवन करने लगे तो भला वह ज्ञान का अर्जन कैसे कर सकता हैं ? विधार्थी विभिन्न आमोद- प्रमोद विषयों में रुचि लेने लग जाए तो उसके ज्ञान में बाधा आ सकती हैं। विधा प्राप्ति में चौथी बाधा बताईं गईं हैं रोग। कोई विधार्थी रोग ग्रस्त हो जाए तो उसे किसी भी प्रकार की बीमारी हो जाए तो उससे भी विधा प्राप्ति में बाधा आ सकती हैं। विद्यार्जन में पांचवी बाधा हैं आलस्य। आलस्य मनुष्यों का महान शत्रु हैं। वह मनुष्य के शरीर में रहता हैं। ज्ञान प्राप्ति में श्रमशीलता बहुत सहायक होती हैं। अतः विधार्थी में पुरुषार्थ होना चाहिए। इन पांच बाधाओं से जो मुक्त रहता हैं और अच्छे ढंग से ज्ञान प्राप्ति को प्रयास करता हैं, प्रतिभा हो और शिक्षक अच्छा विधा का ज्ञान देने का प्रयास करें तो ज्ञान का अर्जन हो सकता हैं। विनय एक बहुत ही प्रिय गुण है। यह गुण क्या है यह मानवता का आभूषण है। नम्रता, ईमानदारी, शालीनता, मधुरभाषिता मिलनसारिता से विनयवान का व्यवहार सरोबार होता है। यह उसके आचरण में शिष्टाचार के संस्कार स्पष्ट परिलक्षित होता है। उसके स्वभाव से दंभ और अभिमान कोसों दूर होते हैं।इसीलिए विनयवान का व्यक्तित्व सदा ही विनम्र और महान होगा। विनयशीलता का सबसे बड़ा उदाहरण मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम है। जिन्होंने पिता के वचनों का सम्मान किया। वह राजपाट का आसन त्याग तनिक हिचकिचाए नहीं। उन्होंने 14 वर्ष वनवास का कठोर जीवन जिया | शिक्षकों का कर्त्तव्य होता हैं कि भावी- पीढ़ी को ज्ञान के साथ – साथ अच्छे संस्कार देने का प्रयास करें। आचार्य श्री तुलसी के समय जीवन विज्ञान का उपक्रम शुरू हुआ था। विधार्थीयों में बौद्धिक व शारीरिक विकास के साथ – साथ भावात्मक विकास भी आवश्यक होता हैं। सही मायने में प्राप्त विद्या और विनम्रता में गहन घनिष्ठता है। आदमी वास्तव में जितना विद्वान होगा वह उतना ही विनयवान होगा। कुछ विद्वान जो दंभी दिखते हैं लेकिन वास्तविक विद्वान कभी नहीं हो सकते है। घमंडी का पद चाहे हो कितना ही ऊँचा ज्ञानी व विनीत के सामने वह सदा नीचा रहेगा। वास्तविक ज्ञानी तो विवेकशील एवं भीतर से बड़ा होगा। वह जानेगा कि छोटे से जीवन में अनावश्यक ही अहम का खंभा क्यों खड़ा किया जाए। वह यह भी जानता है की विनम्रता से हम परायों को भी अपना बना लेते हैं जबकि अभिमान तो अपनों को भी दूर कर देता हैं। अतःयह यथार्थ है कि विद्या ददाती विनयं, अनुभव ज्ञानी स्वयं करता है। व्यक्ति के अहंकार रहित होने और दूसरों के प्रति सम्मान दर्शाने वाले सकारात्मक सद्गुण हैं। जो जीवन में सफलता को सीखने की क्षमता और आत्मीयता बढ़ाते हैं। ये कमजोरी नहीं बल्कि शक्ति के प्रतीक हैं। जैसे फलदार पेड़ का झुकना। विनय का अर्थ अहंकार त्याग कर बड़ों-ज्ञानियों के प्रति आदर और सेवाभाव रखना है। संक्षेप में विनय (विनम्रता) आभूषण है जो हमारे व्यक्तित्व को निखारता है और हमें सबके हृदय में स्थान दिलाता है। यह जीवन के सबसे महत्वपूर्ण सकारात्मक गुण हैं। जो अहंकार के अभाव दूसरों के प्रति आदरनम्रता और सहज व्यवहार आदि को दर्शाते हैं। यह कमजोरी नहीं बल्कि शक्ति का प्रतीक हैं। सच्चा विनय ज्ञानी मिलनसार और अहंमुक्त होना सिखाता हैं जो व्यक्ति को प्रेम सम्मान और आध्यात्मिक प्रगति प्रदान करता है।

— प्रदीप छाजेड़

प्रदीप छाजेड़

छाजेड़ सदन गणेश डूँगरी गेट के पास सबलपुर रोड़ पोस्ट - बोरावड़ जिला - नागौर राज्य - राजस्थान पिन -341502 नम्बर -9993876631