गीत
पथरा गई हैं पुतलियाँ अब अश्रु का अकाल है
जी रहा हूँ लाश बनकर वक्त का यह कमाल है
मौन की चादर ओढ़ ली स्वर सब मेरे निस्तेज हैं
अपनों के तीखे बाण अब स्मृतियों में सहेज हैं
जिनके लिए मैं छाँव था उन्होंने ही जड़ें काट दीं
उम्मीद की जो फसल थी वो नफरतों में बाँट दी
शब्दों के बिच्छू डस रहे सगे संबंधियों के वेश में
मैं जल रहा हूँ मौन होकर अपनों ही के प्रदेश में
साँप बनकर वक्त का हर एक लम्हा डसता है
अपनों का हर ताना अब रूह में मेरी धँसता है
हर बार टूटी नाव मेरी सा हिलों की ओट में
संवेदनाएँ मर गईं अब निरंतर की चोट में
मैं वह दिया हूँ जिसमें अब स्नेह की कोई बूंद नहीं
मैं वह डगर हूँ जिसकी अब मंज़िल की कोई सूझ नहीं
याद का हर एक झोंका बन के शोला झुलसता है
अविश्वास का गहरा खंजर अब कलेजे में धँसता है
अब न कोई आह है न आँखों में कोई स्वप्न है
भीतर जो था इंसान मेरा हो चुका वो दफ़्न है
संवाद के सब पुल गिरे अब सन्नाटों का राज है
मेरी खामोशी ही अब मेरा अंतिम समाज है
शून्य का यह मौन सागर अंतर्मन में हँसता है
मौत का ख़ामोश मंज़र नस-नस में अब धँसता है
— भानु शर्मा रंज
