गीत
शून्य के भाल पर लिख रही ज़िंदगीएक कोरी इबारत उजाले सरीमिट रहा धीरे धीरे पुराना अहम्जैसे गंगा की धारा हिमालय
Read Moreधूम-धड़ाम तड़ाक धड़ाक, बजत ढोल मृदंग नहीं,मद्य-मत्त मद-अंध मनुज, करत कुत्सित ढंग कहीं।बर्फ-तुषार ठिठुरत रैन, न कोई पात न फूल
Read Moreनववर्ष नवयुग जैसा हो यही कल्पना करता मनस्वर्णिम प्रकाश भरे हृदय में छवि करो जैसे दर्पणद्वेष भाव कलुषित घृणा का
Read Moreहे राष्ट्र के प्रहरी तुमसे , दिव्यता भी दिव्य हैसुर्य सम तेज पुंज भाल पे ,रूप अद्भुत भव्य हैहिमाद्रि चोटियों
Read Moreसुमिरन करके जगदंबा को ,नारायण के चरण मनाय लिखूँ लड़ाई प्रियंका की, पंचो सुनिये ध्यान लगाय एक लाडली बेटी देश
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