गीत
साँस की कच्ची गिरह यादों का मेला यहाँभीड़ में भी आदमी फिरता अकेला यहाँअक्स को है पढ़ना यहाँ ख़ुद से
Read Moreधूम-धड़ाम तड़ाक धड़ाक, बजत ढोल मृदंग नहीं,मद्य-मत्त मद-अंध मनुज, करत कुत्सित ढंग कहीं।बर्फ-तुषार ठिठुरत रैन, न कोई पात न फूल
Read Moreनववर्ष नवयुग जैसा हो यही कल्पना करता मनस्वर्णिम प्रकाश भरे हृदय में छवि करो जैसे दर्पणद्वेष भाव कलुषित घृणा का
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