गीत/नवगीत

गीत

मेरे भीतर प्यासा मरुथल बाहर मेघों की टोली
मौन खड़ी है देहरी मेरी दर्द ने खिड़की है खोली

जैसे कोई प्यासा पंछी मृग तृष्णा में भटका हो
जैसे सूखी रेत पे कोई सन्नाटा ही अटका हो
तुम तो सावन बनके बरसे दुनिया की हर बस्ती में
एक हमें ही भूल गए तुम अपनी ही इस मस्ती में
आँखों ने पथराते पथराते पीर की भाषा बोली
मेरे भीतर प्यासा मरुथल बाहर मेघों की टोली

यादों की एक बोझिल गठरी काँधे पर हम ढोते हैं
भीड़ भरी इस दुनिया में भी तनहा होकर रोते हैं
साँस की डोरी खींच र ही है यादों के भारी पत्थर
पीर पुरानी जम बैठी है जैसे काई बन भीतर
ज़ख्मों ने चुपचाप सिसककर नमक की बोरी खोली
मौन खड़ी है देहरी मेरी दर्द ने खिड़की है खोली

बिना गंध के फूल खिला है बिना ज्योति की बाती है
ये कैसी पतझड़ है जिसमें रूह बिखरती जाती है
बिंब पुराने धुंधले हो गए दर्पण धूल से अटा पड़ा
द्वार खड़ा है अंत हमारा जीवन खाली घटा खड़ा
मिट्टी के इस कच्चे घर ने यादों की चंदन रोली
मेरे भीतर प्यासा मरुथल बाहर मेघों की टोली

— भानु शर्मा रंज

भानु शर्मा रंज

कवि और गीतकार धौलपुर राजस्थान M-7976900735, 7374060400