गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

हम भी मुस्कुराते थे कभी बेपरवाह अंदाज़ से,
देखा है आज खुद को कुछ पुरानी तस्वीरों में।

वक़्त ने जैसे चुरा ली हो हँसी होंठों की,
खामोशी बसती है अब हर एक तदबीरों में।

वो जो कल तक थे हमारे हर सफ़र के हमसफ़र,
नाम उनका ही लिखा है अब भी तक़दीरों में।

दिल ने चाहा था कि रुक जाएँ वो लम्हे वहीं,
पर कहाँ वक़्त ठहरता है किसी ज़ंजीरों में।

हमने सोचा भी न था यूँ बदल जाएँगे हम,
खुद को ढूँढा है कई दफ़ा अपनी तहरीरों में।

कभी महफ़िल की रौनक थे, हँसी का कारवाँ,
आज तन्हाई ही मिलती है हमें तदबीरों में।
✍️ हेमंत सिंह कुशवाह

हेमंत सिंह कुशवाह

राज्य प्रभारी मध्यप्रदेश विकलांग बल मोबा. 9074481685