गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

कई बार छत पर भी जाना पड़ा है,
कि इक भारी कपड़ा सुखाना पड़ा है।

मैं जब तेरी मूरत बनाने चला तो,
कई बार इसको गिराना पड़ा है।

बहुत भीड़ में मैंने सामान खोया,
यहां पहले ख़ुद को बचाना पड़ा है।

कि हम ज़िंदा होकर भी ज़िंदा नहीं थे,
यहां ख़ूद को मुरदा दिखाना पड़ा है।

मकां खूबसूरत बनाना था लेकिन,
इसे सिर्फ़ पुख़्ता बनाना पड़ा है।

जहां से हटाई थी तस्वीर तेरी,
इसे फिर वहीं पर लगाना पड़ा है।

— अरुण शर्मा साहिबाबादी

अरुण शर्मा साहिबाबादी

नाम-अरुण कुमार शर्मा क़लमी नाम-अरुण शर्मा साहिबाबादी पिता -जगदीश दत्त शर्मा शिक्षा-एम ए उर्दू ,मुअल्लिम उर्दू ,बीटीसी उर्दू। जीविका उपार्जन- सरकारी शिक्षक पता-एफ़ 73, पहली मंज़िल,पटेल नगर-3, ग़ाज़ियाबाद। मोबाइल-9311281968 पुस्तकें-खोली, झुग्गी,पुल के नीचे एक पत्ती अभी हरी सी है, मुनफ़रिद,इजतिहाद.मुफ़ीक़ ( सभी कविता संग्रह) पुरुस्कार-उर्दूकी कई संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत। कई सम्मान समारोह आयोजित हुए हैं।