गीत
कहीं ओस ढले कहीं आँख ज़रा देख ले आ के सवेरे
तेरी आहट में जागे हैं स्मृतियों के घेरे
पहाड़ों की चोटियों पर धुंध का जो कफ़न ठहरा
नदी की शांत लहरों पर समय का मौन है गहरा
किनारे की रेत जैसे फिसलती जा रही सांसें
न जाने किस क्षितिज पर टिकी हैं थकी ये आँखें
वो जो कल था वो अब भी है
बस इक परछाईं बाकी है
ये सदियों की प्यास है
ये सदियों की साकी है
कहीं ओस ढले कहीं आँख
शब्दों के इस मरुस्थल में भावों की मृगतृष्णा है
हृदय के सूने मंदिर में विरह की ही अर्चना है
काँच सा मन टूटा तो किरचें ही चुभती हैं अब
मौन के इन जंगलों में प्रतिध्वनि गूँजती है कब
जो नयन में समाया है
वही स्वप्नों का स्वामी है
वही शून्य का सार है
वही अंतर्यामी है
कहीं ओस ढले कहीं आँख
शून्य के इस सन्नाटे को कोई सरगम तो दे जाओ
उदास बैठी इन यादों को कोई मरहम तो दे जाओ
रात की चादर को ओढ़े सितारे सिसक रहे हैं
बिछड़ के जो नहीं लौटे वो साँसों में महक रहे हैं
बुझा दो तुम ये तड़प भी
कोई अब भी जीता है
हृदय का जो गरल है
उसे शंकर ही पीता है
कहीं ओस ढले कहीं आँख
— भानु शर्मा रंज
