गीत/नवगीत

गीत

अना को मिटाकर फ़ना होने को
चले हैं मुसाफ़िर दिशा होने को
तड़प ही नहीं प्यास का अंत रंज
नदी मुड़ पड़ी है घटा होने को

बदन की ये सीमा मिल न तो नहीं
कि खुशबू ही गुंचा ओ चमन तो नहीं
जो रूहानी महक है वही प्रेम है
सिर्फ़ लफ़्ज़ों का ये अंजुमन तो नहीं
जैसे चंदन ने अपनी हस्ती गँवाई
हवाओं में मिलकर अमर होने को

निशा ने जो तारों को आँचल में बाँधा
तभी तो सवेरे ने सूरज को साधा
मिटा जो न खुद से वो सृजता है क्या
अधूरा ही होता है पाने का वादा
जैसे पर्वत ने खुद को पत्थर किया है
नदी के चरणों में बसर होने को

रिश्तों की ये डो र बंधन न समझो
धड़कते हुए दिल की धड़कन न समझो
जहाँ स्व पिघलकर सर्व हो गया है
उसे हार का कोई क्रंदन न समझो
सूर्य ने लहू अपना क्षितिज पर बहाया
अँधेरी धरा की सहर होने को

उजड़ना ही बस इक हकीकत नहीं है
सिर्फ़ आहें भरना इबादत नहीं है
देख रंज उस बाँसुरी का कलेजा
जो खाली हुई पर शिकायत नहीं है
उसने खुद के भीतर के शून्य को फूँका
ज़माने के लब पर लहर होने को

— भानु शर्मा रंज

भानु शर्मा रंज

कवि और गीतकार धौलपुर राजस्थान M-7976900735, 7374060400