गीत
मैं समय की फटी बिवाई मैं रेत का रिसता प्याला हूँ,
अपनी ही राख के मलबे में, इक बुझता हुआ उजाला हूँ।
अब कंठ रुँधा है मलबे से, यहाँ लाश ही ख़्वाबों की बिकती है
हर साँस ज़हर का घूँट हुई, कोई राह न तुम बिन दिखती है
विश्वास-वृक्ष को संशय की, ये काली दीमक चाट गई,
उम्मीदों की कोमल गरदन, समय की आरी काट गई।
रिश्ते थे ओस के अक्षर से, जो सूरज चढ़ते ढल बैठे,
सब साये साथ छोड़ भागे, हम नग्न शिला से जल बैठे।
प्राण मुट्ठियों में कसमसाते यहाँ साँस भी गिरवी रखती है
अब बंद हुए सब द्वार यहाँ, कोई राह न तुम बिन दिखती है
मैं उस परिंदे की हसरत, जिसके पंखों में कीलें हैं,
आस के उपजाऊ खलिहान, अब बंजर और रेतीले हैं।
संसार एक वह वधशाला, जहाँ संवेदना बलि चढ़ती है,
हर चीख यहाँ खामोशी की, सूली पर तीखी गढ़ती है।
लहू थमा है रगों में अब, जहाँ उम्मीद भी जलकर बिकती है
अब बंद हुए सब द्वार यहाँ, कोई राह न तुम बिन दिखती है
नसों में लहू नहीं दौड़ता, पिघला हुआ काँच बहता है,
रोम-रोम अब इस तन का, पीड़ा की गाथा कहता है।
मैं उस टूटी नौका का फलक, जो डूब के तल से जा लागी,
अस्तित्व की अंतिम लौ बुझकर, अब शून्य के द्वारे जा जागी।
अब थाम सको तो थाम लो प्रभु, बस तेरी ज़रूरत दिखती है
अब बंद हुए सब द्वार यहाँ, कोई राह न तुम बिन दिखती है
— भानु शर्मा रंज
