गीत
शून्य के भाल पर लिख रही ज़िंदगी
एक कोरी इबारत उजाले सरी
मिट रहा धीरे धीरे पुराना अहम्
जैसे गंगा की धारा हिमालय झरी
स्वप्न की पोटली को किनारे धरा
जागने का नया स्वर सुहाने लगा
जो अभी तक पराया पराया सा था
वो ही अब अपना होकर लुभाने लगा
काँच के घर में पत्थर सँभाले हुए
हार को जीत की एक पायल खरी
शून्य के भाल पर लिख रही ज़िंदगी
भीड़ में खोया चेहरा सुलगता रहा
खोजता ही रहा वह स्वयं का पता
शब्द की देह जब मौन में ढल गई
मिट गई द्वैत की वो पुरानी खता
बूंद अब खुद को सागर समझने लगी
तृप्ति की प्यास अंतर में ऐसी भरी
शून्य के भाल पर लिख रही ज़िंदगी
हो गई रंज की पीर अब आरती
चेतना के शिखर पर उजास हुआ
धूल के इन नगरों को पीछे तजा
सत्य का जब हृदय में निवास हुआ
अब न कोई किनारा न कोई भँवर
डूबकर पार उतरी है जीवन तरी
शून्य के भाल पर लिख रही ज़िंदगी
— भानु शर्मा रंज
