कविता- अमृतांशु-सा जीवन हो
अलसित मन की वेदना, पीड़ा तब बन जाए,
अंतर्द्वंद्व का तिक्त जल, सिर से ऊपर आए।
आत्ममंथन से हो सके, खुद अपनी पहचान,
अमृतांशु-सा जीवन हो, शीतलता बने शान।
अनश्वर प्रभु की सत्ता, नश्वर है संसार,
मिथ्या है जो दिख रहा, यह जीवन का सार।
अभ्युदय की चाह हो, छोड़ें अमर्ष-आक्रोश,
सजग हो सत्कर्म करें, रखें जोश में होश।
नर-नारी छोटे-बड़े, चाहते हैं निज मान,
सुखदायक सम्मान है, व्यथाजनक अपमान।
उत्पीड़ित मन को लगें, मधुर बैन भी बाण,
मन ही जब बस में नहीं, कैसा जाण-अजाण!
तन की पीर मन भी सहे, मन की पीर गंभीर,
मन तो अकेला ही रहे, साथ न देता शरीर।
मन की पीड़ा आधि है, रहने दे नहीं धीर,
आरी जैसे काष्ठ को, मन को देती चीर।
— लीला तिवानी
