कविता

खजुराह

मेरे कंकाल में चिपकी है
कविताओं की एक
पुरानी पांडुलिपि
जिस में मैंने लिखी है
वृक्ष के केश में फँसे हुए
तारों की कहानी

ख्वाब और ख्वाहिशों में
लड़खड़ाती वफाओं को लेकर
खत्म हो चुके प्रेम की तलाश में
नासमझ खजुराहो की नर्तकियाँ
नजर नहीं मिला पाती खुद से
कैसे समझाऊँ उन्हें
इस गुफा के संगीत और
अंधकार के बीच में
समय ने मुझे भी छला है

शाम से उड़ने वाली
मुट्ठी भर धूल
नाचती रहती है देर रात तक
फुसफुसाती है कुछ
मैंने उसे सुन लिया
वह एक सवाल था
“क्या किसी पुरुष ने दी है
कभी अग्निपरीक्षा ?

शिला में लिपटे असंख्य स्वप्न
तड़पते हैं, तड़पते हैं
एक झंकार के लिए
अपने अस्तित्व को
जाहिर करने के लिये
देखते हैं मुझे टकटकी लगाए

हाँ, यह सच तो है
प्राण हो या निष्प्राण
नारी को ही तो ढूँढनी पड़ती है
अपनी अस्मिता

मगर मैं तो हूँ एक अवशेष
इतिहास के खंडहरों में
कैसे कहूँ तुम्हें
भाषा के अलावा
नहीं कोई और हथियार
मेरे पास ।

— पारमिता षड़ंगी

पारमिता षड़ंगी

ओड़िआ साहित्य जगत म एक सुपरिचित नाम । वह अपनी आँचलिकता में सशक्त स्त्री-कथाकार एवं कवयित्री ही नहीं, कुशल ओड़िआ भाषानुवादक भी हैं। नारी मनस्तत्व की विश्लेषण, सूक्ष्म अवबोध की अन्वेषण तथा एक बलिष्ठ कहानी के आधार उनकी कहानियों को अलग परिचय देते हैं। जीवनवादी कहानीकार होते हुए भी पारमिता की कविताएँ चेतना और मानसिकता को खूब प्रभावित करती हैं। हिन्दी और ओड़िआ भाषा में कहानी, कविता लेखन में उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। अब तक उनकी 7 कहानी-संग्रह 5 कविता-संग्रह और 11 अनुवाद-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। पारमिता की रचनाएँ वागर्थ, आजकल, समकालीन भारतीय साहित्य, भाषा ,नूतन कहानियाँ, देशज, देशधारा, विश्वगाथा, कृति बहुमत, माटी ,कथाक्रम, कथारंग, अंतरंग, पाठ, युगवार्त , परिंदा, व्यंजना आदि अनेक सुप्रसिद्ध पत्रिका में प्रकाशित हुई होने के साथ साथ भारत के विभिन्न क्षेत्रों और विदेश में भी प्रकाशित हुई हैं। उनकी रचनाओं का बंगाली, राजस्थानी, मैथिली ,पंजाबी, गुजराती, मराठी, तमिल, ओड़िआ और इंग्लिश भाषा में अनुवाद किया गया है। पारमिता को उनके कहानी-संग्रह 'संबित के पास जब मैं नहीं थी' के लिए महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी की तरफ से पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। मुम्बई मो -9867113113

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