ग़ज़ल
हों ऋचाएँ वेद की या आयतें कुरआन की
राह दोनों ही दिखाती हैं हमें ईमान की
कोई भी हो धर्म, सब का एक ही पैग़ाम है
हो सभी के वास्ते सद्भावना इंसान की
आपसी विश्वास हर संबंध की बुनियाद है
चाह रहती है सभी को प्यार की सम्मान की
राष्ट्र का, माँ-बाप का, वो नाम रौशन कर सकें
परवरिश आओ करें कुछ इस तरह संतान की
काश मिल जाए कोई तिनका सहारे की तरह
आ गयी है मेरी कश्ती ज़द में इक तूफ़ान की
आचरण अपना हमेशा ही रखें उत्तम ‘अजय’
फ़िक्र क्या करनी भला इस रेशमी परिधान की
— अजय अज्ञात
